*بسم الله الرحمن الرحيم*
*الصــلوة والسلام عليك يارسول الله ﷺ*
*विलायत हुज़ूर ताजुश्शरिआ*
हुज़ूर ताजुश्शरिआ अल्लामा मुफ़्ती आलहाज़ अश्शाह मोहम्मद अख़्तर रज़ा अजहरी क़ादरी की पैदाइस25फरवरी1942को मोहल्ला सौदागिरान बरेली शरीफ में हुई।
जब आपकी उम्र चार साल चार माह चार दिन की हुई तो वालिद माजिद मुफ़स्सिरे आज़मे हिन्द मौलाना मोहम्मद इब्राहीन रज़ा जीलानी ने तक़रीब बिस्मिल्लाह ख्वानी मुनाकिद की और उसमें दारुल उलूम मन्ज़रे इस्लाम के जुमला तलबा को दावत दी फिर आपकी बिस्मिल्लाह शरीफ अदा कराई गई और मोहम्मद नाम पर अक़ीक़ा हुआ।
(हयाते ताजुश्शरिआ सफ़्हा29)
*हुज़ूर ताजुश्शरिआ को अवार्ड मिलना*
हुज़ूर ताजुश्शरिआ ने अरबी में बी-ए किया हुज़ूर ताजुशरिआ सिर्फ जामिया अज़हर में ही नही बल्कि पूरे मिस्र में अव्वल नम्बरों से पास हुए हुज़ूर ताजुश्शरिआ1966में जब ज़ामेअ अज़हर काहिरा से फ़ारिग हुए तो करनल जमाल अब्दुलनासिर ने आपको बतौर इनआम ज़ामे अज़हर अवार्ड पेश किया साथ ही साथ सनद से भी नवाज़े गए।
(हयाते ताजुश्शरिआ सफ़्हा119)
हुज़ूर ताजुश्शरिआ ने दारुल उलूम मन्ज़र-ए-इस्लाम में पढ़ा और पढ़ाया जामेअ अज़हर में भी पढ़ा और हुज़ूर ताजुशरिआ दर्सी किताबो के एलावा शुरुह व हवाशी और गैर मुताल्लिक़ किताबों का रोज़ाना कसरत से मुताला करते रहे और आप फरमाते हैं कि मुझे जो कुछ भी मिला हुज़ूर मुफ़्ती-ए-आज़म की सोहबत व इस्तिफादा सालो की मेहनत व मशक़्क़त पर भारी पड़ते थे में आज हर जगह हुज़ूर मुफ़्ती-ए-आज़म का इल्मी व रूहानी फैज़ान पाता हूँ आज जो मेरी हैसियत है वह उन्ही की सोहबत का असर का सदक़ा है।
(हयाते ताजुश्शरिआ सफ़्हा121)
*गैर मुक़ल्लिद के फितना-ए-अज़ीम का सदबार*
गैर मुकल्लिद ने 1993 में अपने एअतिकाद में मसलक की तशहीर के लिये एक नया फार्मूला ईज़ाद किया इसलिये निज़ाई को मिडिया में पेश किया जाये जिससे उम्मत मुस्लिमा में इन्तिशार फैले और वह अहनाफ के खिलाफ हो उसी इन्दिया के पैशे नज़र30मई1993को एक मजलिस में तीन तलाक़ का मसअला मिडिया में उछाल दिया गया कि अब कोई शौहर तीन बार तलाक़ कहे तो शरीअत के मुताबिक तलाक़ नही मानी जहेगी और उससे मर्द व बीवी उसके हुक़्म और जिम्मा दारी पर कोई असर नही पढ़ेगा अगर शौहर एक साथ तीन बार तलाक कहे तो उसे क़ानून एक ही तलाक कहा जायेगा और शरीअत के मुताबिक उसे बदला भी जा सकता है।
(रोज़नामा अमर उजाला बरेली30 मई 1993)
जब इसकी ख़बर हुज़ूर ताजुश्शरिआ को तो आपने एक प्रेस कांफेंस बुलाकर फ़तवा जारी फ़रमाया जिस में वाजेह तौर पर लिखा की तीन तलाक़ नाम व निहाद व जमीअत अहले हदीस का एक बयान अखवार में मुलाहिज़ा हुआ जो न सिर्फ हनफ़ी बल्कि शाफेई मालिकी और हम्बली सभी आइम्मा मज़ाहिब के नज़दीक सरीह खिलाफ और नाक़ाबिले अमल मरदूद व बातिल है और मुसलमानों में फूट डालने की नापाक कोशिश नीज़ सियासी चाल है मजलिस वाहिदा में दी गई तीन तलाक़ ही मानी जायेगी उसपर सभी आइम्मा का इत्तिफ़ाक़ है।【रोज़नामा दैनिक जागरन बरेली31मई1993】
(हयाते ताजुश्शरिआ सफ़्हा 120)
*हुज़ूर ताजुश्शरिआ की करामत*
राये बरेली का रहने वाला शादी शुदा ग्वाला उसने जमादुलअव्वल 1409 हिज़री 1989ई को हुज़ूर ताजुशरिआ के हाथ पर शर्फ़े इस्लाम से मुशर्रफ हुआ उसने इस्लाम लाने का सबब यह बताया कि उसके बाप का इन्तेकाल हो गया था और उसके धर्म में यह है कि जो सब से छोटा बेटा होगा या सब से बड़ा बेटा होगा वह अपने बाप की लाश को जलायेगा और यह भी है कि अपने बाप की लाश पर बास से मारेगा उस लड़के ने एक बॉस सर पर मारा और खयाल किया कि यह मेरा मज़हब गलत है और मुसलमानों का मज़हब सही है और उसने रात को ख्वाब में देखा की हम एक बड़ी मस्ज़िद में बैठे हैं और उस मस्जिद में एक ज़ईफ हसीन खूबसूरत चेहरे वाले तसरीफ फरमा हैं और वह यह कह रहे हैं कि बेटा कलमा पढ़ मैने कलमा पढ़ लिया वह जब बरेली आया तो उसने हुज़ूर ताजुशरिआ को देखा फ़ौरन चीख़ पड़ा की अपने मालिक की कसम फलाँ मस्ज़िद में मैंने खवाब में उन्हीं बुज़ुर्ग को देखा था और उन्होंने ही मुझे कलमा पढ़ाया था वह लड़का फ़ौरन हुज़ूर ताजुशरिआ के दस्ते पाक पर कलमा शरीफ पढ़ लेता है और दाखिले सिलसिला हो जाता है उसका नाम हुज़ूर ताजुश्शरिआ ने अब्दुल्लाह रखा।
(हयाते ताजुश्शरिआ सफ़्हा77)
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*हुज़ूर ताजुश्शरिआ के तालुक से मजीद मालूमात और आप की जिन्दगी के तालुक से हयाते ताजुश्शरिआ का मुताला की गिये।*
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