*_लड़कियों की शादी के लिए भी चन्द करने की बीमारी आम हो गई है। हालांकि यह चन्दा गैर जरूरी इखराजात (ख़र्च) और शादी में नामवरी कमाने के लिए होता है।_*
_इस्लाम में न जहेज़ (दहेज़) वाजिब है, न बारात को खाना खिलाना। इसमें दखल लड़के वालों की ज़्यादती का भी है।_
*_खुलासा यह है कि बिल्कुल सादा निकाह भी कर दिया जाये तो यह बिला शुबह जाइज़ बल्कि आज के हालात के मुनासिब है।_*
_लड़कियों की शादी के लिए भीक मांगने वाले अगर भीक माँगने के बजाय किसी ऐसे के साथ बेटी का निकाह कर दें, जो दूसरी शादी का ख्वाहिशमन्द हो और दो औरतों का कफ़ील हो सके या तलाक दे चुका हो या उसकी बीवी मर गई हो या वह गरीब हो या उम्रसीदा हो। और अपनी इन कमज़ोरियों की वजह से शादी में इखराजात का तालिब न हो, जैसा कि आजकल माहौल है तो यह उनके लिए भीक माँगने से हजारों दर्जे बेहतर है_
*_क्यूंकि लड़की की शादी के लिए भीक माँगना गुनाह व नाजाइज़ है और जिन लोगों का अभी हमने जिक्र किया है, उनके साथ निकाह बिला शुबह जाइज़ है। हॉ बगैर सुवाल करे कोई खुद ही से किसी की मदद करे तो इसमें कोई रोक टोक नहीं। लेकिन सुवाल करना और भीक मॉगना, इस्लाम में सिवाय चन्द मखसूस सूरतों के जो अहादीस व फ़िक़्ह की किताबों में मजकूर हैं, हराम है। और जो सूरतें मजकूर हुई, उनमें शादी ब्याह के गैर ज़रूरी मरासिम अदा करना हरगिज शामिल नहीं।_*
📚 *गलत फ़हमियाँ और उनकी इस्लाह सफहा, 117, 118*
_इस्लाम में न जहेज़ (दहेज़) वाजिब है, न बारात को खाना खिलाना। इसमें दखल लड़के वालों की ज़्यादती का भी है।_
*_खुलासा यह है कि बिल्कुल सादा निकाह भी कर दिया जाये तो यह बिला शुबह जाइज़ बल्कि आज के हालात के मुनासिब है।_*
_लड़कियों की शादी के लिए भीक मांगने वाले अगर भीक माँगने के बजाय किसी ऐसे के साथ बेटी का निकाह कर दें, जो दूसरी शादी का ख्वाहिशमन्द हो और दो औरतों का कफ़ील हो सके या तलाक दे चुका हो या उसकी बीवी मर गई हो या वह गरीब हो या उम्रसीदा हो। और अपनी इन कमज़ोरियों की वजह से शादी में इखराजात का तालिब न हो, जैसा कि आजकल माहौल है तो यह उनके लिए भीक माँगने से हजारों दर्जे बेहतर है_
*_क्यूंकि लड़की की शादी के लिए भीक माँगना गुनाह व नाजाइज़ है और जिन लोगों का अभी हमने जिक्र किया है, उनके साथ निकाह बिला शुबह जाइज़ है। हॉ बगैर सुवाल करे कोई खुद ही से किसी की मदद करे तो इसमें कोई रोक टोक नहीं। लेकिन सुवाल करना और भीक मॉगना, इस्लाम में सिवाय चन्द मखसूस सूरतों के जो अहादीस व फ़िक़्ह की किताबों में मजकूर हैं, हराम है। और जो सूरतें मजकूर हुई, उनमें शादी ब्याह के गैर ज़रूरी मरासिम अदा करना हरगिज शामिल नहीं।_*
📚 *गलत फ़हमियाँ और उनकी इस्लाह सफहा, 117, 118*
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