*【POST 114】हराम तरीके से कमाकर राहे खुदा में ख़र्च करना*

*_यअनी हुज़ूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने साफ तौर पर फरमा दिया कि अस्ल नेकी और दीनदारी और महब्बत,नज़दीकी और पास रहना और हाज़िरी नहीं है बल्कि परहेजगारी यअनी बुरे कामों से बचना, अच्छे काम करना है ख्वाह वो कहीं रह कर हों ।_*

_हज़रते उवैस करनी रदियल्लाहु तआला अन्हु हुज़ूर के ज़माने में थे लेकिन कभी मुलाकात के लिए हाज़िर न हुए मगर हुज़ूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को इतने पसन्द थे कि उनसे मिलने और दुआए मगफिरत कराने की वसीयत सहाबए किराम को फ़रमाई थी।_

📗 *_(सहीह मुस्लिम जिल्द 2 सफा 311)_*

*_एक हदीस शरीफ में तो हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने उनके बारे में तो यहाँ तक फ़रमा दिया कि मेरी उम्मत के एक शख्स की शफाअत से इतने लोग जन्नत में जायेंगे कि जितनी तादाद कबीलए बनू तमीम के अफ़राद से भी ज्यादा होगी।_*

📙 *_(मिश्कात बाबुलहौज़ वश्शफाअह सफ़ा 494)_*

_इस हदीस की शरह में उलेमा ने फरमाया कि *’'उस शख्स"* से मुराद हजरत सय्यिदेना उवैस करनी रदियल्लाहु तआला अन्हु है।_

📘 *_(मिरकात जिल्द 5 सफ़ा 278)_*

*_इन अहादीस से खूब वाज़ेह हो गया कि अस्ल महब्बत पास रहना नहीं, हाज़िरी व चक्कर लगाना नहीं, बल्कि वह काम करना है, जिससे महबूब राज़ी हो।_*

_खुलासा यह कि जो लोग नमाज़ और रोज़े व दीगर अहकामे शरअ के पाबन्द हैं, हरामकारियों और हराम कामों से बचते हैं, वो ख़्वाह बुजुर्गों के मज़ारात पर बार बार हाजिरी न देते हों, वो उनसे बदरजहा बेहतर और महब्बत करने वाले हैं जो खुदाए तआला  व रसूल सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की नाफरमानी करते, हराम खाते और हराम खिलाते रात दिन गानों, तमाशों, जुए ,शराब और लाटरी सिनेमों में लगे रहते हैं_

*_ख़्वाह हर वक़्त  मज़ार पर ही पड़े रहते हों। अलबत्ता वो लोग जो हज़राते अम्बियाएकिराम और औलियाए इज़ाम की शान में गुस्ताखियाँ करते हैं, बेअदबी से बोलते हैं और उनकी बारगाहों में हाज़िरी को शिर्क व बिदअत करार देते हैं उनके अक़ीदे इस्लामी नहीं, उनकी नमाज़ नमाज़ नहीं ,रोज़े रोज़े नहीं ,उनकी तिलावत  कुआन नहीं, उनकी दीनदारी इत्तिबाए रसूले अनाम नहीं,क्यूंकि अदब ईमान की जान है और बेअदब नाम का मुसलमान है।_*

📚 *गलत फ़हमियाँ और उनकी इस्लाह सफहा,119 120*

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