*【POST 121】मुहर्रम व सफ़र में ब्याह शादी न करना और सोग मनाना*

_माहे मुहर्रम में कितनी रसमें बिदअतें और खुराफ़ातें आजकल मुसलमानों में राइज हो गई हैं उनका शुमार करना भी मुश्किल है। उन्हीं में से एक यह भी कि यह महीना सोग और गमी का महीना है। इस माह में ब्याह शादी न की जायें। हालांकि इस्लाम में किसी भी मय्यत का तीन दिन से ज्यादा गम मनाना नाजाइज़ है और इन अय्याम में ब्याह शादी को बुरा समझना गुनाह है। निकाह साल के किसी दिन में मना नहीं चाहे मुहर्रम हो या सफर या और कोई महीना या दिन।_

*_आलाहजरत अलैहिर्रहमतु वर्रिदवान से पूछा गया।_*

*(1) बाज़ अहलेसुन्नत व जमाअत अशरए मुहर्रम में न तो दिन भर रोटी पकाते हैं और न झाडू देते हैं कहते हैं बाद दफ़न ताजिया रोटी पकाई जाएगी।*

*_(2) दस दिन में कपड़े नहीं उतारते।_*

*(3) माहे मुहर्रम में व्याह शादी नहीं करते।*

*_(4) इन अय्याम में सिवाए इमाम हसन और इमाम हुसैन रयिलाहु तआला अन्हुमा के किसी और की नियाज व फातिहा नहीं दिलाते यह जाइज है या नाजाइज़? तो आप ने जवाब में फ़रमाया पहली तीनों बातें सोग हैं और सोग हराम और चौथी बात जहालत। हर महीने में हर तारीख में हर वली की नियाज़ हर मुसलमान की फातिहा हो सकती है।_*

📗 *(अहकामे शरीअत, हिस्सा अव्वल सफहा 127)*

_दर अस्ल मुहर्रम में गम मनाना सोंग करना फ़िरकए मलऊना शीओं और राफ़िज़ियों का काम है और खुशी मनाना मरदूद ख़ारिजियों काम का शेवा और नियाज़ व फातिहा दिलाना, नफ़्ल पढ़ना, रोजे रखना मुसलमानों का काम है।_

*_यूंही मुहर्रम में ताजियादारी करना, मसनूई करबलायें बनाना, उनमें मेले लगाना भी नाजाइज़ व गुनाह है।_*

📚 *गलत फ़हमियाँ और उनकी इस्लाह सफहा, 131, 132*

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