*【POST 57】औरत का कफ़न मैके वालों के जिम्मे लाजिम समझना*

_यह एक गलत रिवाज है। यहाँ तक कि कुछ जगह मैके वाले अगर नादार व ग़रीब हों तब भी औरत का कफ़न उनको देना ज़रूरी ख़्याल किया जाता है और उनसे जबरदस्ती लिया जाता है और उन्हें ख्वामख्वाह सताया जाता है हालाँकि इस्लाम में ऐसा कुछ नहीं है।_

*मसअला यह है कि मय्यत का कफ़न अगर मय्यत ने माल न छोड़ा हो तो ज़िन्दगी में जिसके जिम्मे उसका नान व नफ़का था वह कफ़न दे और औरत के बारे में ख़ास तौर से यह है कि उसने अगरचे माल छोड़ा भी हो तो तब भी उसका कफ़न शौहर के जिम्मे है।*
       
📗 *(बहारे शरीअत हिस्सा 4 सफ़ा 139)*

           खुलासा यह है कि औरत का कफन या दूसरे खर्चे मैके वालों के जिम्मे ही लाज़िम ख़्याल करना और बहरहाल उनसे दिलवाना, एक गलत रिवाज है, जिसको मिटाना ज़रूरी है।

📚 *गलत फ़हमियाँ और उनकी इस्लाह सफहा, 59*

*Note- अक्सर देखा जाता है। बाज़ लोग़ हट धर्मी की हद पार करते है। वो थोड़ा सा भी नही सोंच ते यह मरी हुई औरत हमारी शरीके हयात थी जब से निकाह मे आई तब से उसकी छोटी से लेकर बड़ी जरूरतों को पूरा किया आज वह इस मकाम पर है जहाँ से वह कुछ बोल भी नही सकती है। मे उन लोगों से कहना चाहूँगा जो ऐसी हट धर्मी मे लगें रहते है। कभी अपनी बीबी षे हयात ए जिन्दगी मे एक मर्तबा पूँछ कर देखना तुम्हारे मरने के बाद तुम्हारा कफन मैके बाले ही लायगे फिर उस वक़्त का मंजर देखना जो तुम्हे बरदास्त न होंगा उस औरत के पैर तले से जमीन खिसक जाएगी जब तुम उससे ऐसे अल्फाज बोलोंगे। मेरे भाईयों जिन्दगी भर इतना किया बाद मरने के भी अपनी बीबी के लिए उसके कफन से महरूम न रखना बरना बाद मरने के अल्लाह तआला की बारगाह मे सर को उठा न पओगे अगर ऐसी सोंच  रखोगे।*

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