*【POST 05】इमान व अकीदे से ज्यादा अमल को अहमियत देना*

हमारे काफी अवाम भाई किसी की जाहिर दारी नेकी और कोई अच्छा काम देखकर उसकी तारीफ करने लगते हैं और उससे मुतासिर (प्रभावित) हो जाते जबकी इस्लामी नुक्ताए नजर से कोई नेकी उस वक्त तक कार आमद नही है। जब तक कि उसका ईमान व अकीदा दुरूस्त न हो।

*रसूलुल्लाह सल्लल्लाहो तआला अलह वसल्लम ने जब ऐलाने नबुव्वत फरमाया था तो पहले नमाज, जकात, रोजा, हज और अहकामव अमाल का हुक्म नही दिया था बल्की यह फरमाया था कि अल्लाह को एक मानो बुतो की पूजा व परस्तिस से बाज आओ और मुझको अल्लाह का रसूल मानो। आज जब किसी गैर मुस्लिम को मुसलमान करते है। तो सबसे पहले उसे नमाज रोजे अदा करने अच्छाइयाँ करने और बुराईयां छोड़ने का हुक्म नही दिया जाता है बल्की पहले कलमा पढ़ाकर मुसलमान किया जाता है फिर बाद मे अच्छाई बुराई और अहकाम ए इस्लाम से उसको आगाह किया जाता है।*

📖 _हदीश शरीफ मे है रसूलुल्लाह सल्लल्लाहो तआला अलह वसल्लम ने फरमाया कि अगर कोई शख्स उहद पहाड़ के बराबर  भी सोना राहे खुदा मे खर्च करे खुदाए तआला कबूल नही फरमाएगा जब तक कि वह तकदीर पर ईमान न लाये।_
 
📗 *(मिश्कात शरीफ सफा 23)*
 
*इस हदीश से खूब वाजेह हो गया कि जो इस्लाम के लिऐ जरूरी अकाइद न रखता हो उसकी कोई नेकी, नेकी नही।*

कुर्आन करीम मे भी फरमाने खुदावन्दी है यह कुर्आन हिदायत है मुत्तकीन (तकवे वालो) के लिऐ जो बगैर देखे ईमान लाये है और नमाज अदा करते और हमारे दिये हुए माल मे से (हमारी राह में) खर्च करते है।
                 
📖 *(पारा 9 रूकूअ 9)*

इस आयते करीमा मे भी अल्लाह तआला ने नमाज और राहे खुदा मे खर्च से पहले ईमान का ज़िक्र फरमाया है।
     
*खुलासा यह है। कि जिस शख्स का ईमान व अकीदा दुरूस्त न हो या वह गैर इस्लामी ख्यालात व अकाइद रखता हो उससे कभी मुतास्सिर (प्रभावित) नही होना चाहिए न उसकी तारीफ करना चाहिए चाहे वह कितने ही अच्छे काम करे।*
     
📖 _कुर्आन करीम मे गैर इस्लामी अकाइद रखने वालो कि नेकियो और उनके कारनामो को बेकार व फूजूल फरमाया गया है और इसकी मिसाल उस गुबार से दी गई है जो किसी चट्टान पर लग जाती हैं फिर उसे बारिश धोकर बहा देती है और उसका नाम व निशान तक बाकी नही रहता।_

📚 *गलत फ़हमियाँ और उनकी इस्लाह सफहा, 16 17 18.*

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