_पार्ट :- 01_
*_इस्लामी भाईयो ! आज कल बुज़ुर्गाने दीन के मज़ारात पर उनके उर्सों का नाम लेकर खूब मौज मस्तियां हो रही हैं और अपनी रंग रंगेलियों, बाजों, तमाशों, औरतों की छेड़छाड़ के मजे उठाने के लिए अल्लाह वालों के मज़ारों को इस्तेमाल किया जा रहा है और ऐसे लोगों को न खुदा का ख़ौफ़ है, न मौत की फिक्र और न जहन्नम का डर।_*
_आज कुफ्फार व मुशरिकीन यह कहने लगे हैं कि इस्लाम भी दूसरे मजहबों की तरह नाच, गानों, तमाशों, बाजों और बेपर्दा औरतों को स्टेजों पर लाकर बे हाई का मुज़ाहिरा करने वाला मज़हब है लिहाज़ा अहले कुफ़्र के इस्लाम कबूल करने की जो रफ्तार थी उसमें बहुत बड़ी कमी आ गई है।_
*_मज़हबे इस्लाम में बतौर लहव व लइब ढोल, बाजे और मज़ामीर हमेशा से हराम रहे हैं। बुखारी शरीफ की हदीस है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहुतआलाअलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया :_*
_"जरूर मेरी उम्मत में ऐसे लोग होने वाले हैं जो ज़िना रेशमी कपड़ों, शराब और बाजों ताशों को हलाल ठहरायेंगे।"_
📗 *_(सही बुख़ारी, जिल्द 2, किताबुल अशरिबह, सफहा 837)_*
*_दूसरी हदीस में हुज़ूर नबीए करीम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने कियामत की निशानियां बयान करते हुए फ़रमाया :_*
_"कियामत के करीब नाचने गाने वालियों और बाजे ताशों की कसरत हो जाएगी।"_
📘 *_(तिर्मिजी, मिश्कातबाबे अशरातुस्साअह सफ़हा 470)_*
*_फतावा आलमगीरी जो अब से साढ़े तीन सौ साल पहले बादशाहे हिन्दुस्तान मुहीयुद्दीन औरंगज़ेब आलमगीर रहमतुल्लाह तआला अलैह के हुक्म से उस दौर के तकरीबन सभी मुसतनद व मोतबर उलमाए किराम ने जमा होकर मुरतब फरमाई जो अरबी जबान (भाषा) में तकरीबन तीन हज़ार सफ़हात और छह जिल्दों पर फैला हुआ एक अज़ीम इस्लामी इन्साइक्लोपीडिया है। उस में लिखा है।_*
_"सिमा, कव्वाली और रक्स (नाच कूद)जो आज कल के नाम निहाद सूफियों में राइज है यह हराम है इस में शिरकत जाइज़ नही।"_
📙 *_(फतावा आलमगीरी ,जिल्द 5, किताबुल कराहियह ,बाब 17 ,सफहा 352)_*
*आलाहज़रत मौलाना शाह अहमद रज़ा खां साहब अलैहिर्रहमा का फतवा अरब व अजम में माना जा रहा है उन्होंने मज़ामीर के साथ कव्वालियों को अपनी किताबों में कई जगह हराम लिखा है। कुछ लोग कहते हैं मज़ामीर के साथ कव्वाली चिश्तिया सिलसिले में राइज और जाइज़ है। यह बुज़ुर्गाने चिश्तिया पर उनका खुला बोहतान है बल्कि उन बुजुर्गों ने भी मज़ामीर के साथ कव्वाली सुनने को हराम फरमाया है। सय्यिदना महबूबे इलाही निज़ामुद्दीन देहलवी रहमतुल्लाहि तआला अलैह ने अपने ख़ास ख़लीफ़ा सय्यिदना फ़ख़रुद्दीन ज़रदारी से मसअलए कव्वाली के मुतअल्लिक एक रिसाला लिखवाया जिसका नाम ‘कश्फुल किनान अन उसूलिस्सिमा’ है। इसमें साफ लिखा है : हमारे बुज़ुर्गों का सिमा इस मज़ामीर के बोहतान से बरी है (उनका सिमा तो है) सिर्फ कव्वाल की आवाज़ अशआर के साथ हो जो कमाल सनअते इलाही की ख़बर देते हैं।*
_कुतबुल अकताब सय्यिदना फरीदुद्दीन गंज शकर रहमतुल्लाह तआला अलैह के मुरीद और सय्यिदना महबूब इलाही निज़ामुद्दीन देहलवी रहमतुल्लाह तआला अलैह के ख़लीफ़ा सय्यिदना मुहम्मद बिन मुबारक अलवी किरमानी रहमतुल्लाहि तआला अलैह अपनी मशहूर किरताब ‘सैरुल औलिया’ में तहरीर फरमाते हैं:_
*_“महबूब इलाही ख्वाजा निज़ामुद्दीन देहलवी अलैहिर्रहमतु वर्रिदवान ने फरमाया कि चन्द शराइत के साथ सिमा हलाल है_*
*(1) सुनाने वाला मर्द कामिल हो छोटा लड़का और औरत न हो।*
*(2) सुनने वाला यादे खुदा से ग़ाफ़िल न हो।*
*(3) जो कलाम पढ़ा जाएफ़हश, बेहयाई और मसखरगी न हो।*
*(4) आलए सिमाअ यानी सारंगी मज़ामीर व रुबाब से पाक हो।*
📕 *_(सैरुल औलियाबाब 9, दर सिमा, वज्द व रक्स, सफ़हा 501)_*
📚 *गलत फ़हमियाँ और उनकी इस्लाह सफहा,140, 141, 142*
*_इस्लामी भाईयो ! आज कल बुज़ुर्गाने दीन के मज़ारात पर उनके उर्सों का नाम लेकर खूब मौज मस्तियां हो रही हैं और अपनी रंग रंगेलियों, बाजों, तमाशों, औरतों की छेड़छाड़ के मजे उठाने के लिए अल्लाह वालों के मज़ारों को इस्तेमाल किया जा रहा है और ऐसे लोगों को न खुदा का ख़ौफ़ है, न मौत की फिक्र और न जहन्नम का डर।_*
_आज कुफ्फार व मुशरिकीन यह कहने लगे हैं कि इस्लाम भी दूसरे मजहबों की तरह नाच, गानों, तमाशों, बाजों और बेपर्दा औरतों को स्टेजों पर लाकर बे हाई का मुज़ाहिरा करने वाला मज़हब है लिहाज़ा अहले कुफ़्र के इस्लाम कबूल करने की जो रफ्तार थी उसमें बहुत बड़ी कमी आ गई है।_
*_मज़हबे इस्लाम में बतौर लहव व लइब ढोल, बाजे और मज़ामीर हमेशा से हराम रहे हैं। बुखारी शरीफ की हदीस है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहुतआलाअलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया :_*
_"जरूर मेरी उम्मत में ऐसे लोग होने वाले हैं जो ज़िना रेशमी कपड़ों, शराब और बाजों ताशों को हलाल ठहरायेंगे।"_
📗 *_(सही बुख़ारी, जिल्द 2, किताबुल अशरिबह, सफहा 837)_*
*_दूसरी हदीस में हुज़ूर नबीए करीम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने कियामत की निशानियां बयान करते हुए फ़रमाया :_*
_"कियामत के करीब नाचने गाने वालियों और बाजे ताशों की कसरत हो जाएगी।"_
📘 *_(तिर्मिजी, मिश्कातबाबे अशरातुस्साअह सफ़हा 470)_*
*_फतावा आलमगीरी जो अब से साढ़े तीन सौ साल पहले बादशाहे हिन्दुस्तान मुहीयुद्दीन औरंगज़ेब आलमगीर रहमतुल्लाह तआला अलैह के हुक्म से उस दौर के तकरीबन सभी मुसतनद व मोतबर उलमाए किराम ने जमा होकर मुरतब फरमाई जो अरबी जबान (भाषा) में तकरीबन तीन हज़ार सफ़हात और छह जिल्दों पर फैला हुआ एक अज़ीम इस्लामी इन्साइक्लोपीडिया है। उस में लिखा है।_*
_"सिमा, कव्वाली और रक्स (नाच कूद)जो आज कल के नाम निहाद सूफियों में राइज है यह हराम है इस में शिरकत जाइज़ नही।"_
📙 *_(फतावा आलमगीरी ,जिल्द 5, किताबुल कराहियह ,बाब 17 ,सफहा 352)_*
*आलाहज़रत मौलाना शाह अहमद रज़ा खां साहब अलैहिर्रहमा का फतवा अरब व अजम में माना जा रहा है उन्होंने मज़ामीर के साथ कव्वालियों को अपनी किताबों में कई जगह हराम लिखा है। कुछ लोग कहते हैं मज़ामीर के साथ कव्वाली चिश्तिया सिलसिले में राइज और जाइज़ है। यह बुज़ुर्गाने चिश्तिया पर उनका खुला बोहतान है बल्कि उन बुजुर्गों ने भी मज़ामीर के साथ कव्वाली सुनने को हराम फरमाया है। सय्यिदना महबूबे इलाही निज़ामुद्दीन देहलवी रहमतुल्लाहि तआला अलैह ने अपने ख़ास ख़लीफ़ा सय्यिदना फ़ख़रुद्दीन ज़रदारी से मसअलए कव्वाली के मुतअल्लिक एक रिसाला लिखवाया जिसका नाम ‘कश्फुल किनान अन उसूलिस्सिमा’ है। इसमें साफ लिखा है : हमारे बुज़ुर्गों का सिमा इस मज़ामीर के बोहतान से बरी है (उनका सिमा तो है) सिर्फ कव्वाल की आवाज़ अशआर के साथ हो जो कमाल सनअते इलाही की ख़बर देते हैं।*
_कुतबुल अकताब सय्यिदना फरीदुद्दीन गंज शकर रहमतुल्लाह तआला अलैह के मुरीद और सय्यिदना महबूब इलाही निज़ामुद्दीन देहलवी रहमतुल्लाह तआला अलैह के ख़लीफ़ा सय्यिदना मुहम्मद बिन मुबारक अलवी किरमानी रहमतुल्लाहि तआला अलैह अपनी मशहूर किरताब ‘सैरुल औलिया’ में तहरीर फरमाते हैं:_
*_“महबूब इलाही ख्वाजा निज़ामुद्दीन देहलवी अलैहिर्रहमतु वर्रिदवान ने फरमाया कि चन्द शराइत के साथ सिमा हलाल है_*
*(1) सुनाने वाला मर्द कामिल हो छोटा लड़का और औरत न हो।*
*(2) सुनने वाला यादे खुदा से ग़ाफ़िल न हो।*
*(3) जो कलाम पढ़ा जाएफ़हश, बेहयाई और मसखरगी न हो।*
*(4) आलए सिमाअ यानी सारंगी मज़ामीर व रुबाब से पाक हो।*
📕 *_(सैरुल औलियाबाब 9, दर सिमा, वज्द व रक्स, सफ़हा 501)_*
📚 *गलत फ़हमियाँ और उनकी इस्लाह सफहा,140, 141, 142*
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