_आजकल काफ़ी लोग ऐसा करते हुए देखे गए हैं कि जब_
*नमाजे जनाज़ा में तकबीर कही जाती है तो हर तकबीर के वक़्त ऊपर की जानिब मुंह उठाते हैं हालांकि इसकी कोई अस्ल नहीं।*
बल्कि नमाज में आसमान की तरफ मुंह उठाना मकरूहे तहरीमी है। *(बहारे शरीअत)* और हदीस शरीफ में है। *रसूलुल्लाह सल्लल्लाहो तआला अलह वसल्लम* ने
*फ़रमाया ‘‘क्या हाल है उन लोगों का जो नमाज़ में आसमान कीतरफ़ आखे उठाते है इससे बाज़ रहें या उनकी आंखें उचक ली जायेंगी।*
📘 *(मिश्कात बहवाला सहीह मुस्लिम सफहा 90)*
खुलासा यह कि नमाजे जनाज़ा हो या कोई और नमाज़ कसदन आसमान की तरफ़ नज़र उठाना मकरूह है और नमाजे जनाज़ा में तकवीर के वक्त ऊपर को नजर उठाने का जो रिवाज पड़ गया है यह ग़लत है, वे अस्ल है।
📚 *गलत फ़हमियाँ और उनकी इस्लाह सफहा, 54*
📍 *Note- इमाम अहमद बिन हम्बल रदीअल्लाहो ताला अनहो ने फरमाया हमारे जनाज़े फैसला करेगे हक पर कौन है। जेसा की आप हजरात ने देखा तकरीबन कुछ दिन पहले बरेली की मुकद्दश ज़मी पर चारो तरफ लाखो नहीँ करोडों की तादात मे कई अफराद वहा पहुँचे और सरकार ताजोहश्शरिया अलहिर्रहमा की नमाज़े जनाज़े मे शिर्कत की यह फकीर कादरी भी मोजूद था वहा पर मेने अपनी आँखो से देखा इतनी तादात मे हाजरीन। हजरत की तदफीन मे पहुँचे और किसी को खरोंच भी न आई यह बरेली के ताज़े शरीअत की करामत ही तो है। बरना आप लोगो ने कई मर्तबा सुना होगा जहाँ लाखों अफराद एक साथ मोजूद होते है कोई न कोई हादसा ज़रूर होता है लेकिन देखने बालो ने देखा सुनने बालो ने सुना इतनी तादात होने के बाद भी किसी को कुछ न हुआ ऐसी सोच रखने बाले उन पिलपिले सुलहकुल्लियो से कहूँगा अरे यह तो कुछ भी नही अगर इससे 10 गुना तादात और होती तब भी कुछ न होता किसी का।*
*एक और बात शरीअत की जहाँ इतनी तादात होने के बाद भी माइक पर नमाज़ न हुई और शरीअत का हक अदा किया इसको बरेली कहते है बरेली जहाँ तबीयत परस्ती के लिए शरीयत से खिलवाड़ नही किया जाता*
*नमाजे जनाज़ा में तकबीर कही जाती है तो हर तकबीर के वक़्त ऊपर की जानिब मुंह उठाते हैं हालांकि इसकी कोई अस्ल नहीं।*
बल्कि नमाज में आसमान की तरफ मुंह उठाना मकरूहे तहरीमी है। *(बहारे शरीअत)* और हदीस शरीफ में है। *रसूलुल्लाह सल्लल्लाहो तआला अलह वसल्लम* ने
*फ़रमाया ‘‘क्या हाल है उन लोगों का जो नमाज़ में आसमान कीतरफ़ आखे उठाते है इससे बाज़ रहें या उनकी आंखें उचक ली जायेंगी।*
📘 *(मिश्कात बहवाला सहीह मुस्लिम सफहा 90)*
खुलासा यह कि नमाजे जनाज़ा हो या कोई और नमाज़ कसदन आसमान की तरफ़ नज़र उठाना मकरूह है और नमाजे जनाज़ा में तकवीर के वक्त ऊपर को नजर उठाने का जो रिवाज पड़ गया है यह ग़लत है, वे अस्ल है।
📚 *गलत फ़हमियाँ और उनकी इस्लाह सफहा, 54*
📍 *Note- इमाम अहमद बिन हम्बल रदीअल्लाहो ताला अनहो ने फरमाया हमारे जनाज़े फैसला करेगे हक पर कौन है। जेसा की आप हजरात ने देखा तकरीबन कुछ दिन पहले बरेली की मुकद्दश ज़मी पर चारो तरफ लाखो नहीँ करोडों की तादात मे कई अफराद वहा पहुँचे और सरकार ताजोहश्शरिया अलहिर्रहमा की नमाज़े जनाज़े मे शिर्कत की यह फकीर कादरी भी मोजूद था वहा पर मेने अपनी आँखो से देखा इतनी तादात मे हाजरीन। हजरत की तदफीन मे पहुँचे और किसी को खरोंच भी न आई यह बरेली के ताज़े शरीअत की करामत ही तो है। बरना आप लोगो ने कई मर्तबा सुना होगा जहाँ लाखों अफराद एक साथ मोजूद होते है कोई न कोई हादसा ज़रूर होता है लेकिन देखने बालो ने देखा सुनने बालो ने सुना इतनी तादात होने के बाद भी किसी को कुछ न हुआ ऐसी सोच रखने बाले उन पिलपिले सुलहकुल्लियो से कहूँगा अरे यह तो कुछ भी नही अगर इससे 10 गुना तादात और होती तब भी कुछ न होता किसी का।*
*एक और बात शरीअत की जहाँ इतनी तादात होने के बाद भी माइक पर नमाज़ न हुई और शरीअत का हक अदा किया इसको बरेली कहते है बरेली जहाँ तबीयत परस्ती के लिए शरीयत से खिलवाड़ नही किया जाता*
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