*【POST 61】जिन्दगी में कब्र व मज़ार बनवाना*

_कुछ लोग अपनी जिन्दगी में कब्र तय्यार कराते हैं, यह मुनासिब नहीं। अल्लाह तआला फरमाता है :_

*_तर्जमा : कोई नहीं जानता कि वह कहीं मरेगा।_*

         कब्र तय्यार रखने का शरअन हुक्म नहीं अलबत्ता कफन सिलवा कर रख सकता है कि जहाँ कहीं जाये अपने साथ ले जाये। और तब हमराह (साथ) नहीं जा सकती
     
📘 *(अलमलफूज़ हिस्सा अव्वल सफा 69)*
     
*"कुछ खानकाहियों को देखा कि वह जिन्दगी में पक्का मज़ार बनवा लेते हैं। यह रियाकारी है गोया कि उनको यह यकीन है कि वह अल्लाह के वली और बुजुर्ग व बेहतर बन्दे हैं और इस मरतबे को पहुंचे हुए हैं कि आम लोगों की तरह कच्ची कहें नहीं बल्कि उन्हें खूबसूरत मजार में दफन होना चाहिए। हालाँकि सच्चे वलियों का तरीका यह रहा है कि वह खुद को गुनाहगार ख्याल करते थे, जो खुद को वली ख्याल करते और अपनी विलायत के ऐलान करते फिरते हैं, ये लोग औलियाए किराम की रविश पर नहीं हैं।*

*पीराने पीर सय्यिदिना गौसे आजम शेख अब्दुल कादिर जीलानी रदिल्लाहु तआला अन्हु* _से बड़ा बुजुर्ग व वली हजार साल में न कोई हुआ और न कियामत तक होगा। उनके बारे में हजरते सूफी जमाँ शैख मुसलेहुद्दीन सअदी शीराज़ी नक़ल करते हैं कि उनको हरमे कअबा में लोगों ने देखा कि कंकरियों पर सर रख कर खुदाए तआला की बारगाह में अर्ज कर रहे थे।_
   
*"ऐ परवरदिगार अगर मैं सजा का मुस्तहक हूँ  तो तु मुझको कियामत के रोज अन्धा करके उठाना ताकि नेक आदमियों के सामने मुझको शर्मिन्दगी न हो।”*
     
📗 *(गुलिस्ताँ बाब 2 सफ़ा 67)*

_बाज सहाबए किराम के बारे में आया है कि वह यह दुआ करते थे ‘‘ऐ अल्लाह मुझे जब मौत आये तो या जगल का कोई दरिन्दा मुझे फाड़ कर खा जाये या कहीं समुद्र में डूब कर मर जाऊँ और मछलियों की गिज़ा हो जाऊँ।"_

*यआनी वह शोहरत से बचना चाहते थे और नाम व नमूद के बिल्कुल रवादार न थे और यही अस्ल फकीरी व दुरवेशी है, और आजकल के फकीरों को अपने मज़ारों की फिक्र पड़ी है*
                   
_साहिबो! चाहने मानने वाले मुरीदीन व मोअतक़दीन (अकीदत रखने वाले) बनाने और बढ़ाने और मज़ार व कर्मी को उम्दा व खूबसूरत बनाने या बनवाने से ज्यादा आख़िरत की फिक्र करो। खुदा व रसूल को राज़ी करो। मुरीदीन व मुअतक़दीन की कसरत और मज़ार की उम्दगी और संगेमरमर की टुकड़ियाँ अजाबे इलाही और कब्र की पिटाई से बचा नहीं सकेंगी अगर आप केकारनामों और दंगों से खुदा व *रसूलुल्लाह सल्लल्लाहो तआला अलह वसल्लम* नाराज़ हैं।_

*ऐसी फ़क़ीरी व सज्जादगी से भी क्या फ़ाइदा कि कब्र के अन्दर आपकी बदअमलियों या बदएतकादियों और रियाकारियों की वजह से पिटाई होती हो और मज़ार पर मुरीदीन चादरें चढ़ाते फूल बरसाते और धूम धाम से उर्स मनाते हों।*

_कोशिश इस बात की करो कि मुरीद हों या न हों, मज़ार बने या न बने चादरें चढ़े या न चढ़े उर्स हो या न हो लेकिन कब्र में आपको राहत मिलती हो और जन्नत की खिड़की खुलती हो ख्वाह ऊपर से कर कच्ची हो और यह नेमत हासिल होगी, खुदा व रसूल के हुक्म पर चलने से_

📚 *गलत फ़हमियाँ और उनकी इस्लाह सफहा, 62,63*

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