*औरतों को तो मज़ारात पर जाने की इजाज़त नहीं मर्दो के लिए इजाजत है मगर वह भी चन्द उसूल के साथ :*
*_(1) पेशानी ज़मीन पर रखने को सज्दा कहते हैं यह अल्लाह तआला के अलावा किसी के लिए हलाल नहीं किसी बुजुर्ग को उसकी ज़िन्दगी में या मौत के बाद सज्दा करना हराम है। कुछ लोग मज़ारात पर नाक और पेशानी रगड़ते हैं यह बिल्कुल हराम है।_*
*_(2) मज़ारात का तवाफ़ करना यानी उसके गिर्द ख़ानाए काबा की तरह चक्कर लगाना भी नाजाइज़ है।_*
*_(3) अज़ रूए अदब कम से कम चार हाथ के फासले पर खड़ा होकर फातिहा पढ़े चूमना और छूना भी मुनासिब नहीं।_*
📙 *(अहकामे शरीअत सफ़हा 234)*
*(4) मज़ामीर के साथ कव्वाली सुनना हराम है तफ़सील के लिए देखिये।*
📗 *(फ़तावा रजविया, जिल्द 10, सफहा 54 से 56)*
_कुछ लोग समझते हैं कि सज्दा बगैर नियत और काबे की तरफ़ मुतवज्जेह हुए नहीं होता। यह भी जाहिलाना ख्याल है सज्दे में जिसकी ताज़ीम या इबादत की नियत होगी उसको सज्दा माना जाएगा। और जो सज्दा अल्लाह की इबादत की नियत से किया जाएगा वह अल्लाह तआला के लिए होगा और जो मज़ारात पर या किसी भी गैरे खुदा के सामने किया जाए वह उसी के लिए होगा। खुलासा यह कि ज़मीन पर किसी बन्दे के सामने सर रखना हराम है। यूंही बक़दरे रूकूअ झुकना भी मना है हाँ हाथ बाँध कर खड़ा होना जाइज़ है।_
📚 *गलत फ़हमियाँ और उनकी इस्लाह सफहा, 64*
*Note- आज कल देखा जाता है हमारे कुछ बाज़ लोग कम इल्मी के बजह से मजारात पर सज्दा करते है तवाफ़ करते नज़र आते जिनकी बजह से गैरो को हम पर तोहमत लगाने का मौक़ा मिल जाता है। इसलिए इस्लाम मे इल्म दीन शीखने को फ़र्ज कहा है। हमारे भोले भाले मुसलमान कम इल्म की वजह से खिलाफे शरअ काम करते नज़र आते है। मे उनसे यही कहूँगा इल्म हासिल करो इसके लिए चाहें तुम्हे कही भी जाना पढ़े।*
*_(1) पेशानी ज़मीन पर रखने को सज्दा कहते हैं यह अल्लाह तआला के अलावा किसी के लिए हलाल नहीं किसी बुजुर्ग को उसकी ज़िन्दगी में या मौत के बाद सज्दा करना हराम है। कुछ लोग मज़ारात पर नाक और पेशानी रगड़ते हैं यह बिल्कुल हराम है।_*
*_(2) मज़ारात का तवाफ़ करना यानी उसके गिर्द ख़ानाए काबा की तरह चक्कर लगाना भी नाजाइज़ है।_*
*_(3) अज़ रूए अदब कम से कम चार हाथ के फासले पर खड़ा होकर फातिहा पढ़े चूमना और छूना भी मुनासिब नहीं।_*
📙 *(अहकामे शरीअत सफ़हा 234)*
*(4) मज़ामीर के साथ कव्वाली सुनना हराम है तफ़सील के लिए देखिये।*
📗 *(फ़तावा रजविया, जिल्द 10, सफहा 54 से 56)*
_कुछ लोग समझते हैं कि सज्दा बगैर नियत और काबे की तरफ़ मुतवज्जेह हुए नहीं होता। यह भी जाहिलाना ख्याल है सज्दे में जिसकी ताज़ीम या इबादत की नियत होगी उसको सज्दा माना जाएगा। और जो सज्दा अल्लाह की इबादत की नियत से किया जाएगा वह अल्लाह तआला के लिए होगा और जो मज़ारात पर या किसी भी गैरे खुदा के सामने किया जाए वह उसी के लिए होगा। खुलासा यह कि ज़मीन पर किसी बन्दे के सामने सर रखना हराम है। यूंही बक़दरे रूकूअ झुकना भी मना है हाँ हाथ बाँध कर खड़ा होना जाइज़ है।_
📚 *गलत फ़हमियाँ और उनकी इस्लाह सफहा, 64*
*Note- आज कल देखा जाता है हमारे कुछ बाज़ लोग कम इल्मी के बजह से मजारात पर सज्दा करते है तवाफ़ करते नज़र आते जिनकी बजह से गैरो को हम पर तोहमत लगाने का मौक़ा मिल जाता है। इसलिए इस्लाम मे इल्म दीन शीखने को फ़र्ज कहा है। हमारे भोले भाले मुसलमान कम इल्म की वजह से खिलाफे शरअ काम करते नज़र आते है। मे उनसे यही कहूँगा इल्म हासिल करो इसके लिए चाहें तुम्हे कही भी जाना पढ़े।*
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