_कुछ लो एतिकाफ़ मे चुपचाप बैठे रहने को ज़रूरी समझते हैं हालाँकि एतिकाफ़ मे चुप रहना न ज़रूरी न महज ख़ामोशी कोई इबादत बल्कि चुप रहने को सबाब की बात समझना मकरूहे तहरीमी है।_
📗 *(बहारे शरीअत हिस्सा 5 सफ़हा 153)*
*अल्बत्ता बुरी बातों से चुप रहना ज़रूरी है। खुलासा यह कि एतिकाफ़ की हालत मे कुर्आन मजीद की तिलावत करे तसवीह व दुरूद का विर्द करे नफ़्ल पढ़े दीनी किताबों का मुताअला करें दीन की बाते सीखने और सिखाने मे कोई हरज नही बल्कि इबादत है। ज़रूरत के वक़्त कोई दुनिया की जाइज़ बात भी की जा सकती है। इससे एतिकाफ़ फ़ासिद नही होगा । हाँ ज़्यादा दुनियावी बातचीत से एतिकाफ़ बेनूर हो जाता है। और सबैब कम होता है।*
📚 *गलत फ़हमियाँ और उनकी इस्लाह सफहा, 67*
*_एतिकाफ़ पर बैठना यह भी एक सुन्नत है। जिसको हर इन्सान को अगर हर साल न कर सके तो ज़िन्दगी मे एक मर्तबा एतिकाफ़ पर बैठना चाहिए एतिकाफ़ एक ऐसी इबादत है। किसी एक बैठने से पूरी बस्ती को अजाब से निजात मिलतीं है। माशा अल्लाह किसी एक शख्श के बेठने से पूरी बस्ती का अजाब उठा लिया जाता है। अगर पूरी बस्ती मे 4-5 मस्जिद हो और हर मस्जिद मे एतिकाफ़ पर कई हजरात बैठें हो अल्लाह हुअकबर उस बस्ती पर अल्लाह अपनी रहमतो को नुजूल बरसाता होगा कुर्बान जाओ लब पर जिसने हम गुनहगारों को इतना सब दिया लेकिन हम उसका भी गलत फायदा उठाते है।_*
_आजकल ज्यादा देखा जाता है। मस्जिदों मे कम उम्र बाले ज़्यादा और हमारे बुजुर्ग कम बैठते है। अल्लाह पाक सबको बैठने की तोफीक दे बहिर हाल मेरे कहने का मकसद यह है। जो हमारी आज की जनरेशन है। एतिकाफ़ पर बैठती है। उनके साथ उनके कई दोस्त यार एक दूसरे को देख कर बेठते है। लेकिन हम अपने उन नोजवान भाईयों से इतना कहना चाहता हू। अए मेरे भाई *अल्लाह ने अपने हबीब सल्लल्लाहो तआला अलह वसल्लम* के सदके मे यह रातें हमे दी है। इनकी कद्र करो अक्सर देखा जाता है। हमारे नौजवान भाई पूरी रात जागते है। पर इबादत मे नही फ़ोन मे बिजी रहते है। या बातो मे मसगूल रहते है। मे उनसे इतना पूँछना चाहूँगा क्या *अल्लाह तआला* तुम्हारे एतकाफ हो कुबूल करेगा या नही सोचो मेरे नौजवान भाईयों अगर तुमने एतिकाफ़ की नियत की है। उसे सही तरीके से निभाओ जिससे *अल्लाह और अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहो तआला अलह वसल्लम* राजी हो जाए।_
_दुआ है। रब तबारक तआला से हमे सही मायनो मे शरीयत का पाबंद बना दे।_
*आमीन सुम्मा आमीन या रब्बुल आलमीन*
📗 *(बहारे शरीअत हिस्सा 5 सफ़हा 153)*
*अल्बत्ता बुरी बातों से चुप रहना ज़रूरी है। खुलासा यह कि एतिकाफ़ की हालत मे कुर्आन मजीद की तिलावत करे तसवीह व दुरूद का विर्द करे नफ़्ल पढ़े दीनी किताबों का मुताअला करें दीन की बाते सीखने और सिखाने मे कोई हरज नही बल्कि इबादत है। ज़रूरत के वक़्त कोई दुनिया की जाइज़ बात भी की जा सकती है। इससे एतिकाफ़ फ़ासिद नही होगा । हाँ ज़्यादा दुनियावी बातचीत से एतिकाफ़ बेनूर हो जाता है। और सबैब कम होता है।*
📚 *गलत फ़हमियाँ और उनकी इस्लाह सफहा, 67*
*_एतिकाफ़ पर बैठना यह भी एक सुन्नत है। जिसको हर इन्सान को अगर हर साल न कर सके तो ज़िन्दगी मे एक मर्तबा एतिकाफ़ पर बैठना चाहिए एतिकाफ़ एक ऐसी इबादत है। किसी एक बैठने से पूरी बस्ती को अजाब से निजात मिलतीं है। माशा अल्लाह किसी एक शख्श के बेठने से पूरी बस्ती का अजाब उठा लिया जाता है। अगर पूरी बस्ती मे 4-5 मस्जिद हो और हर मस्जिद मे एतिकाफ़ पर कई हजरात बैठें हो अल्लाह हुअकबर उस बस्ती पर अल्लाह अपनी रहमतो को नुजूल बरसाता होगा कुर्बान जाओ लब पर जिसने हम गुनहगारों को इतना सब दिया लेकिन हम उसका भी गलत फायदा उठाते है।_*
_आजकल ज्यादा देखा जाता है। मस्जिदों मे कम उम्र बाले ज़्यादा और हमारे बुजुर्ग कम बैठते है। अल्लाह पाक सबको बैठने की तोफीक दे बहिर हाल मेरे कहने का मकसद यह है। जो हमारी आज की जनरेशन है। एतिकाफ़ पर बैठती है। उनके साथ उनके कई दोस्त यार एक दूसरे को देख कर बेठते है। लेकिन हम अपने उन नोजवान भाईयों से इतना कहना चाहता हू। अए मेरे भाई *अल्लाह ने अपने हबीब सल्लल्लाहो तआला अलह वसल्लम* के सदके मे यह रातें हमे दी है। इनकी कद्र करो अक्सर देखा जाता है। हमारे नौजवान भाई पूरी रात जागते है। पर इबादत मे नही फ़ोन मे बिजी रहते है। या बातो मे मसगूल रहते है। मे उनसे इतना पूँछना चाहूँगा क्या *अल्लाह तआला* तुम्हारे एतकाफ हो कुबूल करेगा या नही सोचो मेरे नौजवान भाईयों अगर तुमने एतिकाफ़ की नियत की है। उसे सही तरीके से निभाओ जिससे *अल्लाह और अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहो तआला अलह वसल्लम* राजी हो जाए।_
_दुआ है। रब तबारक तआला से हमे सही मायनो मे शरीयत का पाबंद बना दे।_
*आमीन सुम्मा आमीन या रब्बुल आलमीन*
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