*【POST 66】रेडियो, तार, टेलीफोन, की ख़बर पर बगैर शरई सबूत के चाँद मान लेना?*

*पार्ट-1*
   _आजकल काफी लोग सिर्फ रेडियो, तार, टेलीफोन की ख़बर पर बगैर चाँद देखे या बगैर शरई सुबूत के ईद मना लेते हैं या रमज़ान शरीफ का चाँद हो तो रोज़ा रख लेते हैं, यह गलत है। अगर आसमान पर धुन्ध गुबार या बादल हो तो रमज़ान के चाँद के लिए एक और ईद के चाँद के लिए दो बा शरअ दीनदार भले मर्दों की गवाही ज़रूरी है। आसमान साफ हो तो बहुत से लोगों का चांद देखना जरूरी है एक दो की गवाही काफी नहीं महज रेडियो, तार व टेलीफोन की ख़बर पर न रोजा रखें न ईद मनायें जब तक कि आप की बस्ती में शरई तौर पर चाँद का। सबूत न हो या दूसरी बस्ती में चाँद देखा गया हो और शरई तौर पर इस की इत्तिला आप तक न आ गई हो। रेडियो, टेलीफोन पर ईद मनाई जाए तो आजकल पूरी दुनिया में एक ही दिन ईद होना चाहिए और हमेशा ईद का चाँद 29 दिन का ही होना चाहिए। क्यूंकि दुनिया में ईद का चाँद कहीं न कहीं 29 का जरूरी हर साल मान लिया जाता है और आजकल पूरी दुनिया में इसकी खबर हो जाना बज़रिए रेडियो, टेलीफोन एक आम व आसान सी बात है तो रोजे कभी 39 हो ही नहीं सकते।_

*सऊदी अरब मे भी अमूमन हिन्दुस्तान से हमेशा एक दिन पहले ईद मनाई जाती है तो रेडियो, टेलीफ़ोन पर अकीदा रखने वाले वहाँ के ऐलान पर ईद क्यूं नहीं मनाते? देहली के ऐलान पर क्यूं मनाते हैं? इस्लामाबाद, कराची, लाहौर, ढाका और रंगून की इत्तिलाआत क्यूं नजर अन्दाज कर दी जाती हैं?*

_अगर कोई यह कहे वह दूसरे मुल्क हैं तो हम पूछते हैं यह। मुल्कों के तक्सीम और बटवारे क्या कुरआन व हदीस की रू से हैं? क्या खुदा व रसूल ने कर दिये हैं या आजकल की मौजूदा सियासत और अक़वामे मुत्तहिदा की तरफ़ से हैं? और अकवाने मुत्तहिदा की तकसीम की शरीअते इस्लामिया में क्या कोई हैसियत है? यह भी तो हो सकता है कि कोई कौमी हुकमरा खुदाए तआला पैदा फ़रमाये और वह इन सब मुल्कों को फतेह करके सब को एक ही मुल्क बना डाले और ऐसा हुआ भी है।_

*और अगर जवाबन कोई कहे कि मुल्क दूसरा और दूरी ज्यादा होने की बिना पर मतलअन अलग अलग है तो ख्याल रहे। कि इख्तिलाफे मताअले मोतबर नहीं और अगर बिल फर्ज मान भी लीजिये तो हिन्दुस्तान के वह शहर और इलाके जो अपने मुल्क के शहरों देहली मुम्बई और कलकत्ता वोरा से दूर हैं और दूसरे मुल्कों पाकिस्तान, बंगलादेश, बर्मा, चीन, तिब्बत, लंका, नेपाल के बाज शहरों से करीब हैं तो उन्हें आप चाँद के मामले में कहाँ की पैरवी करने का मशवरा देंगे अपने मुल्क की या जिन मुल्कों और शहरों से वह करीब हैं वहाँ की? और वह मतलअ के बारे में देहली, मुम्बई और कलकत्ता की मुवाफिक़त करेंगे या दूसरे मुल्कों के अपने से करीब इलाकों की?*

_खुलासा यह कि बगैर शरई सुबूत के महज रेडियो, तार व टेलीफोन की खबरों पर चाँद के मामले में एतिबार करना इस्लाम व कुरआन व हदीस के मुतलक़न ख़िलाफ़ है_

📘 *(फतावा आलम गीरी मिसरी जिल्द 3 सफहा 357 में है।)*
📚 *गलत फ़हमियाँ और उनकी इस्लाह सफहा, 68 69*

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