*पार्ट-2*
_‘‘पर्दे के पीछे से अगर कोई शख्स गवाही दे तो उसकी गवाही मोतबर नहीं क्यूंकि एक आवाज़ दूसरी आवाज़ की तरह होती है।"_
*तो रेडियो और टेलीफ़ोन पर बोलने वाला तो हज़ारों लाखों पर्दों आड़ों के पीछे है उसकी गवाही क्यूं मोतबर होगी?*
_फिर यह कि अगर आप की बस्ती में 29 का चाँद न हुआ। और किसी जगह हो गया और आप तक शरअन इत्तिला न आई आपने रोज़ा न रखा या ईद का चाँद है और ईद न मनाई बल्कि रोज़ा रखा तो आप पर हरगिज़ कोई गुनाह व अज़ाब नहीं क्यूंकि अजाब व सवाब की कुंजी अल्लाह तआला के दस्ते कुदरत में है।_
*लिहाज़ा आप वह कीजिये जिसका उसने हुक्म दिया है और उतना कीजिये जितना उसने फरमाया है। हदों से आगे मत बढ़िये और रेडियो टेलीफोन सुन सुन कर शोर मत मचाइये, कूद फॉद मत कीजिये। जाने दीजिये पूरी दुनिया में ईद हो जाए अगर आप तक शरई इत्तिला नहीं है आप रोज़ा रखिये आप से बरोजे कियामत कोई पुरसिश न होगी फिर फ़िक्र की क्या जरूरत है। फिक्र तो उसकी कीजिये जिसके बारे में कम व हश्र में सवाल होगा।*
_हदीस शरीफ़ में रसूलुल्लाह सल्लल्लाहो तआला अलह वसल्लम इरशाद फरमाते हैं कि महीना कभी 29 का हो जाता है तो जब तक चाँद न देखो रोज़ा न रखो और अगर तुम्हारे सामने अब्र या गुबार आ जाए तो 30 दिन की गिनती पूरी करो।_
📘 *(बुख़ारी व मुस्लिम मिश्कात, सफहा 174)*
📚 *गलत फ़हमियाँ और उनकी इस्लाह सफहा, 69,70*
📍 *Note- गौर करने का मकाम है कि मौजूदा दौर की कचहरियों में भी जज और हाकिम गवाहों को सामने बुला कर गवाही लेते हैं अगर कोई घर बैठे टेलीफ़ोनों के ज़रिए गवाही दे दे तो हरगिज़ न मानेगे तो शरई अहकाम और शहादतों की आख़िर आपकी निगाह में कोई अहमियत है या नहीं, जिन्हें आप तार, टेलीफोन और रेडियो के हवाले किये दे रहे हैं। खुदाए तआला का खौफ खाइये और आप दीनदार बनने की कोशिश कीजिये दीन का ठेकेदार बनने की कोशिश मत कीजिये। वह जिस का है। काम उस पर छोड़ दीजिये और अपनी अपनी बस्ती के उलमा और इमाम जो अहले हक हों उनकी बात पर अमल कीजिये।*
_‘‘पर्दे के पीछे से अगर कोई शख्स गवाही दे तो उसकी गवाही मोतबर नहीं क्यूंकि एक आवाज़ दूसरी आवाज़ की तरह होती है।"_
*तो रेडियो और टेलीफ़ोन पर बोलने वाला तो हज़ारों लाखों पर्दों आड़ों के पीछे है उसकी गवाही क्यूं मोतबर होगी?*
_फिर यह कि अगर आप की बस्ती में 29 का चाँद न हुआ। और किसी जगह हो गया और आप तक शरअन इत्तिला न आई आपने रोज़ा न रखा या ईद का चाँद है और ईद न मनाई बल्कि रोज़ा रखा तो आप पर हरगिज़ कोई गुनाह व अज़ाब नहीं क्यूंकि अजाब व सवाब की कुंजी अल्लाह तआला के दस्ते कुदरत में है।_
*लिहाज़ा आप वह कीजिये जिसका उसने हुक्म दिया है और उतना कीजिये जितना उसने फरमाया है। हदों से आगे मत बढ़िये और रेडियो टेलीफोन सुन सुन कर शोर मत मचाइये, कूद फॉद मत कीजिये। जाने दीजिये पूरी दुनिया में ईद हो जाए अगर आप तक शरई इत्तिला नहीं है आप रोज़ा रखिये आप से बरोजे कियामत कोई पुरसिश न होगी फिर फ़िक्र की क्या जरूरत है। फिक्र तो उसकी कीजिये जिसके बारे में कम व हश्र में सवाल होगा।*
_हदीस शरीफ़ में रसूलुल्लाह सल्लल्लाहो तआला अलह वसल्लम इरशाद फरमाते हैं कि महीना कभी 29 का हो जाता है तो जब तक चाँद न देखो रोज़ा न रखो और अगर तुम्हारे सामने अब्र या गुबार आ जाए तो 30 दिन की गिनती पूरी करो।_
📘 *(बुख़ारी व मुस्लिम मिश्कात, सफहा 174)*
📚 *गलत फ़हमियाँ और उनकी इस्लाह सफहा, 69,70*
📍 *Note- गौर करने का मकाम है कि मौजूदा दौर की कचहरियों में भी जज और हाकिम गवाहों को सामने बुला कर गवाही लेते हैं अगर कोई घर बैठे टेलीफ़ोनों के ज़रिए गवाही दे दे तो हरगिज़ न मानेगे तो शरई अहकाम और शहादतों की आख़िर आपकी निगाह में कोई अहमियत है या नहीं, जिन्हें आप तार, टेलीफोन और रेडियो के हवाले किये दे रहे हैं। खुदाए तआला का खौफ खाइये और आप दीनदार बनने की कोशिश कीजिये दीन का ठेकेदार बनने की कोशिश मत कीजिये। वह जिस का है। काम उस पर छोड़ दीजिये और अपनी अपनी बस्ती के उलमा और इमाम जो अहले हक हों उनकी बात पर अमल कीजिये।*
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