*_कुछ लोग फ़क़ीरों म मस्जिदों, मदरसों को यूँही देते रहते है। और बाक़ाइदा ज़कात नही निकालते उनसे कहा जाता है। कि आप जकात निकालिये तो कह देते है। कि हम वैसे ही राहे खुदा मे काफी खर्च करते रहते है। यह उनकी सख़्त गलतफहमी है। आप हजार राहे खुदा मे खर्च करदे लेकिन जब तक हिसाब करके नियते ज़कात से ज़कात अदा न करेगे आप के इख़राजात जो राहे खुदा ही मे किये है। यह ज़कात न निकालने के अज़ाब व बबाल से आपको बचा नही सकेंगे।_*
हदीश शरीफ़ मे है। कि जिसको अल्लाह तआला माल दे और वह उसकी ज़कात अदा न करे तो क़ियामत के दिन वह माल गंजे सांप की शक्ल मे कर दिया जाएगा जिसके सर पर दो चोटियां होंगी वह सांप उनके गले मे तौक बना कर डाल दिया जाएगा। फिर उसकी बांछें पकड़ेगा और कहेगा मै तेरा माल हूँ मै तेरा ख़जाना हूँ। ख़ुलासा यह कि राहे ख़ुदा मे ख़र्च करने के जितने तरीक़े है। उनमे सबसे अव्वल ज़कात है। नियाज़ नज़्र और फ़ातिहायें वगैरा भी उसी माल से की जाये जिसकी ज़कात अदा की गई हो। वरना वह क़ाबिले क़बूल नहीं। अपनी ज़कात खुद खाते रहना और राहे ख़ुदा मे ख़र्च करने वाले बनना बहुत बड़ी ग़लतफहमी है। और शैतान का धोखा है। इस मसअले की ख़ूब तहक़ीक और तफसील देखना हो तो *आला हज़रत इमाम अहमद रज़ा ख़ाँ रहमतुल्लाह तआला अलैह* बरेलवी की तसनीफ *"अअज़्जुल इकतिनाह"* का मुतालआ कीजिये। ज़कात सिर्फ़ साल मे एक बार निकलती है। और वह एक हज़ार मे 25 रूपये है। लह जो कि साहिबे निसाब पर निकालना फ़र्ज है। मसाइले ज़कात उलमा से मालूम किये जायें और बाक़ाइदा ज़कात निकाली जाए। ताकि नियाज़ व नज्र और सदका व खैरात भी क़ुबूल हो सके।
📚 *गलत फ़हमियाँ और उनकी इस्लाह सफहा, 73 74*
*आज यौमे बिलादत इमाम हसन रदीअल्लाहो ताला अनहो आप सभी हजरात को मुबारक हो अल्लाह रब्बुल इज्जत अपने हबीब सल्लल्लाहो तआला अलह वसल्लम के लाड़ले नवाशो के सदके मे हम सब रोज़ दारो को प्यास की सिद्दत से महफ़ूज रखे और माहे रमज़ान का सदका नसीब फरमाए।*
*आमीन सुम्मा आमीन या रब्बुल आलमीन*
हदीश शरीफ़ मे है। कि जिसको अल्लाह तआला माल दे और वह उसकी ज़कात अदा न करे तो क़ियामत के दिन वह माल गंजे सांप की शक्ल मे कर दिया जाएगा जिसके सर पर दो चोटियां होंगी वह सांप उनके गले मे तौक बना कर डाल दिया जाएगा। फिर उसकी बांछें पकड़ेगा और कहेगा मै तेरा माल हूँ मै तेरा ख़जाना हूँ। ख़ुलासा यह कि राहे ख़ुदा मे ख़र्च करने के जितने तरीक़े है। उनमे सबसे अव्वल ज़कात है। नियाज़ नज़्र और फ़ातिहायें वगैरा भी उसी माल से की जाये जिसकी ज़कात अदा की गई हो। वरना वह क़ाबिले क़बूल नहीं। अपनी ज़कात खुद खाते रहना और राहे ख़ुदा मे ख़र्च करने वाले बनना बहुत बड़ी ग़लतफहमी है। और शैतान का धोखा है। इस मसअले की ख़ूब तहक़ीक और तफसील देखना हो तो *आला हज़रत इमाम अहमद रज़ा ख़ाँ रहमतुल्लाह तआला अलैह* बरेलवी की तसनीफ *"अअज़्जुल इकतिनाह"* का मुतालआ कीजिये। ज़कात सिर्फ़ साल मे एक बार निकलती है। और वह एक हज़ार मे 25 रूपये है। लह जो कि साहिबे निसाब पर निकालना फ़र्ज है। मसाइले ज़कात उलमा से मालूम किये जायें और बाक़ाइदा ज़कात निकाली जाए। ताकि नियाज़ व नज्र और सदका व खैरात भी क़ुबूल हो सके।
📚 *गलत फ़हमियाँ और उनकी इस्लाह सफहा, 73 74*
*आज यौमे बिलादत इमाम हसन रदीअल्लाहो ताला अनहो आप सभी हजरात को मुबारक हो अल्लाह रब्बुल इज्जत अपने हबीब सल्लल्लाहो तआला अलह वसल्लम के लाड़ले नवाशो के सदके मे हम सब रोज़ दारो को प्यास की सिद्दत से महफ़ूज रखे और माहे रमज़ान का सदका नसीब फरमाए।*
*आमीन सुम्मा आमीन या रब्बुल आलमीन*
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