*【POST 72】हज़रत अली मुश्किल कुशा और सोलह सय्यिदों का रोज़ा*

_कुछ जगह औरतें *अली मुश्किल कुशा रदिअलाहो तआला अन्हुमा* का रोज़ा रखती हैं। तो रोज़ा हो या कोई इबादत सब अल्लाह तआला के लिए ही होती है। हाँ अगर यह नियत कर ली जाए कि इस का सवाब *हज़रते अली रदीअल्लाहो तआला अन्हुमा* की रूहें पाक को पहुँचे तो यह अच्छी बात है। लेकिन इस रोज़े में इफ़्तार आधी रात में करतीं हैं और घर का दरवाज़ा खोल कर दुआ मांगती हैं। यह सब खुराफात और वाहियात और वहमपरस्ती की बातें हैं।_

📙 *(फ़तावा रजविया, जिल्द 4, सफ़हा 660)*

_यूं ही 16 रजब को सोलह सय्यिदों को रोज़ा रखा जाता है। उसमें जो कहानी पढ़ी जाती है, वह गढ़ी हुई है।_

📚 *गलत फ़हमियाँ और उनकी इस्लाह सफहा, 73*

*Note :- हदीस शरीफ हज़रत अबू हुरैरा रज़ी अल्लाहु अन्हुमा से रिवायत है के रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहिवसल्लम ने फ़रमाया:📖*

_सब रोज़ों में अफ़ज़ल रोज़ा रमज़ान का रोज़ा है और उसके बाद *मुहर्रम* का रोज़ा है।_
     
📗 *(सहीह मुस्लिम हदीस 2755)*

*-अक्सर लोग इसमें कन्फ्यूज़ होते हैं के कितने रोज़े रखने हैं? तो जितना आप रख सकते हैं रखें जितना रखें उतना फायदा है। लेकिन 9/10 या 10/11 मुहर्रम के रोज़े ज़रूर रखें ये सुन्नत है। कुछ बाज़ औरते और आदमी मोहर्रम मे मछली खाने से परहेज़ करते है। यह सब उनकी गलतफहमी है। इस्लाम मे ऐसी बातों की कोई अस्ल नही है। मछली खाना जाइज़ है और उस पर फातहा भी हो सकती है। चाहे रमज़ान मुबारक का महीना हो या माहे मोहर्रमुल हराम का महीना हो।*

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