*【POST 75】शरअ पयम्बरी महर मुक़र्रर करना*

_कभी कभी कुछ जगहों पर निकाह में महर शरअ पयम्बरी मुकर्रर किया जाता और उस से उनकी मुराद चौंसठ रुपए और दस आने होती है या कोई और रकम। हालांकि यह सब वे अस्ल बातें हैं, *शरीअते पैगम्बरे आज़मﷺ* ने महर में ज़्यादती की कोई हद मुक़र्रर नहीं है जितने पर दोनों फरीक मुत्तफ़िक हो जायें वही महर शरए पयम्बरी है हाँ कम से कम महर की मिकदार दस दिरहम यानी तकरीबन दो तोले तेरह आने भर चांदी है उस से कम महर सही नहीं अगर बाँधा गया तो महरे मिस्ल लाजिम आएगा। और बाज़ लोग महर शरअ पयम्बरी से *सय्यिदतुना फ़ातिमा रदियल्लाह तआला अन्हा* के अक़दे मुबारक का महर ख्याल करते हैं हालांकि ख़ातूने जन्नत के निकाहे मुबारक का महर चार सौ मिस्काल यानी डेढ़ सौ तोले चांदी था।_

*_खुलासा यह कि शरअ की तरफ से महर की कोई रकम मुकर्रर नहीं की गई। हाँ यह ज़रूर है कि दस दिरहम यानी दो तोले तेरह आने भर चांदी से कम कीमत में न हो।_*

📚 *गलत फ़हमियाँ और उनकी इस्लाह सफहा,76,77*

*Note-  नबी करीम सल्लल्लाहो तआला अलह वसल्लम ने इरशाद फरमाया जिसने किसी उल्मा से मुसआफा किया गोया उसने मुझसे मुसआफा किया आप सल्लल्लाहो तआला अलह वसल्लम ने उल्मा को नाएबे रसूल बताया है। आपने जो कहा जो किया वह हम सुन्नी मुसलमानो के लिए त कयामत तक हक हो गया यही हम सुन्नियो का अक़ीदा भी अल्हमदो लिल्लाह लेकिन बाज़ लोग़  जाने अंजाने उल्मा को गाली गलोज करते है। और फिर तोबा भी नही करते है।*

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