यह रिवाज भी ग़लत है। सुन्नत यह है। कि खुतबए निकाह ईजाब व क़बूल से पहले पढ़ा जाए।
📚 *गलत फ़हमियाँ और उनकी इस्लाह सफहा, 77*
*इमामे हुसैन रदियल्लाहो तआला अन्हो की शहादत के बाद मुसलसल (लगातार) कितने महीनों तक आसमान के किनारे सुर्ख़ (लाल) रहे ?*
*👉🏻6 महीनें तक*
*मुजद्दीद इमाम जलालुद्दीन सुयूती अश-शाफ़ई लिखतें है*
*"इमाम हुसैन रदिअल्लाहो तआला अन्हो* की शहादत का वाक़या बहुत तवील और दिल-गुदाज़ (दिल को नरम करने वाला) है। जिसको लिखने और सुनने की दिल मे ताक़त नही है आपकी शहादत के बाद 7 दिन तक अंधेरा रहा, दीवारों पर धूप का रंग ज़र्द पढ़ गया था और बहुत से सितारे भी टुटे आपकी शहादत 10 मुहर्रम सन 61 हिजरी को वाक़ए हुई आपकी शहादत के दिन सूरज गहन में आ गया था और मुसलसल 6 महीनों तक आसमान के किनारे सुर्ख़ यानी लाल रहे उसके बाद में रफ़्ता-रफ़्ता वह सुर्खी जाती रही अलबत्ता जो सुर्खी सूरज निकलते और डूबते वक़्त नमूदार होती है कहा जाता है आज तक वही सुर्खी मौजूद है जो शहादते हुसैन से पहले मौजूद न थी
📗 *(इमाम सुयूती शाफ़ई,तारीख़ उल खुलफ़ा-पेज-304)*
*Note- किसी यतीम के सर पर हाथ फेर दीजियेगा उसके बालों के बराबर सवाब मिलेगा*
📚 *गलत फ़हमियाँ और उनकी इस्लाह सफहा, 77*
*इमामे हुसैन रदियल्लाहो तआला अन्हो की शहादत के बाद मुसलसल (लगातार) कितने महीनों तक आसमान के किनारे सुर्ख़ (लाल) रहे ?*
*👉🏻6 महीनें तक*
*मुजद्दीद इमाम जलालुद्दीन सुयूती अश-शाफ़ई लिखतें है*
*"इमाम हुसैन रदिअल्लाहो तआला अन्हो* की शहादत का वाक़या बहुत तवील और दिल-गुदाज़ (दिल को नरम करने वाला) है। जिसको लिखने और सुनने की दिल मे ताक़त नही है आपकी शहादत के बाद 7 दिन तक अंधेरा रहा, दीवारों पर धूप का रंग ज़र्द पढ़ गया था और बहुत से सितारे भी टुटे आपकी शहादत 10 मुहर्रम सन 61 हिजरी को वाक़ए हुई आपकी शहादत के दिन सूरज गहन में आ गया था और मुसलसल 6 महीनों तक आसमान के किनारे सुर्ख़ यानी लाल रहे उसके बाद में रफ़्ता-रफ़्ता वह सुर्खी जाती रही अलबत्ता जो सुर्खी सूरज निकलते और डूबते वक़्त नमूदार होती है कहा जाता है आज तक वही सुर्खी मौजूद है जो शहादते हुसैन से पहले मौजूद न थी
📗 *(इमाम सुयूती शाफ़ई,तारीख़ उल खुलफ़ा-पेज-304)*
*Note- किसी यतीम के सर पर हाथ फेर दीजियेगा उसके बालों के बराबर सवाब मिलेगा*
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