_काफ़ी लोग यह ख़्याल करते हैं कि शौहर के लिए ज़रूरी है कि निकाह के बाद पहली मुलाक़ात में अपनी बीवी से पहले महर माफ़ कराये फिर उसके जिस्म को हाथ लगाये। यह एक गलत ख़्याल है, इस्लाम में ऐसा कुछ नहीं। महर माफ कराने की कोई ज़रूरत नहीं। आजकल जो महर राइज है, उसे 'गैर मुअज्जल’ कहते हैं, जो या तो तलाक देने पर या फिर दोनों में से किसी एक की मौत पर देना वाजिब होता है। इससे पहले देना वाजिब नहीं, हाँ अगर पहले दे दे तो कोई हर्ज नहीं बल्कि निहायत उम्दा बात है। माफ़ कराने की कोई ज़रूरत नहीं और महर माफ कराने के लिए नहीं बांधा जाता है। अब दे या फिर दे, वह देने के लिए है, माफ कराने के लिए नही।_
*_हाँ अगर महर मुअज्जल’ हो यअनी निकाह के वक़्त नकद देना तय कर लिया गया हो तो बीवी को इख्तियार है कि वह अगर चाहे तो बगैर महर वसूल किये खुद को उसके काबू में न दे और उसको हाथ न लगाने दे और चाहे तो बगैर महर लिये भी उसको यह सब करने दे, माफ कराने का यहाँ भी कोई मतलब नहीं।_*
📚 *गलत फ़हमियाँ और उनकी इस्लाह सफहा,79*
*Note- आज हम कितनी गफ़लत मे है। अल्लाह तआला हमे बख्श देगा यकीनन अल्लाह तआला की जात व बरकात रहमत बाली है। जिसमे ज़र्रा बराबर भी इनकार करना कुफ़्र होंगा और खारिजे इस्लाम होंगा अल्लाह तआला जिसे चाहे बख्श दे जिसे चाहे सज़ा दे यह अल्लाह तआला के इख्तियार मे है। लेकिन ज़रा सोचो मुसलमानो हम किस नबी करीम सल्लल्लाहो तआला अलह वसल्लम की उम्मत मे पैदा है। जिस उम्मत मे पैदा होंने के लिए कई नबी अलेहिस्सलाम ने दुआ ए कि लेकिन हमारे नबी सल्लल्लाहो तआला अलह वसल्लम ने हर वक़्त अपनी उम्मत के लिए दुआ की या अल्लाह तआला मेरी उम्मत अल्लाह अल्लाह हमारे आका सल्लल्लाहो तआला अलह वसल्लम कितने बड़े सखी है। लेकिन आज हम अपनी गुलामी का सबूत सिर्फ़ नाम के मुसलमान होने से दे रहें हमे आज नाम से मुसलमान होना जाना जाता है। कभी आमाल से पहचान करके देखना दिल की गहराई से सोंचना क्या ऐसे मुसलमान होते अगर लगे हा हम खसारे मे है। तो अपनी मस्जिदो को आबाद करना बस मेरी हर मोमिन मुसलमान से इतनी गुजारिश है। पाक रहना सीखलो हर वक़्त मेरा दावा है। यही पाकी तुम्हें अपनी मस्जिद के करीब कर देंगी इन्शा अल्लाह तआला*
*नमाज़ पढ़ो नमाज़ कायम करो अपने इमामो के साथ खुलूस और अख्लाक से पैस आओ*
*_हाँ अगर महर मुअज्जल’ हो यअनी निकाह के वक़्त नकद देना तय कर लिया गया हो तो बीवी को इख्तियार है कि वह अगर चाहे तो बगैर महर वसूल किये खुद को उसके काबू में न दे और उसको हाथ न लगाने दे और चाहे तो बगैर महर लिये भी उसको यह सब करने दे, माफ कराने का यहाँ भी कोई मतलब नहीं।_*
📚 *गलत फ़हमियाँ और उनकी इस्लाह सफहा,79*
*Note- आज हम कितनी गफ़लत मे है। अल्लाह तआला हमे बख्श देगा यकीनन अल्लाह तआला की जात व बरकात रहमत बाली है। जिसमे ज़र्रा बराबर भी इनकार करना कुफ़्र होंगा और खारिजे इस्लाम होंगा अल्लाह तआला जिसे चाहे बख्श दे जिसे चाहे सज़ा दे यह अल्लाह तआला के इख्तियार मे है। लेकिन ज़रा सोचो मुसलमानो हम किस नबी करीम सल्लल्लाहो तआला अलह वसल्लम की उम्मत मे पैदा है। जिस उम्मत मे पैदा होंने के लिए कई नबी अलेहिस्सलाम ने दुआ ए कि लेकिन हमारे नबी सल्लल्लाहो तआला अलह वसल्लम ने हर वक़्त अपनी उम्मत के लिए दुआ की या अल्लाह तआला मेरी उम्मत अल्लाह अल्लाह हमारे आका सल्लल्लाहो तआला अलह वसल्लम कितने बड़े सखी है। लेकिन आज हम अपनी गुलामी का सबूत सिर्फ़ नाम के मुसलमान होने से दे रहें हमे आज नाम से मुसलमान होना जाना जाता है। कभी आमाल से पहचान करके देखना दिल की गहराई से सोंचना क्या ऐसे मुसलमान होते अगर लगे हा हम खसारे मे है। तो अपनी मस्जिदो को आबाद करना बस मेरी हर मोमिन मुसलमान से इतनी गुजारिश है। पाक रहना सीखलो हर वक़्त मेरा दावा है। यही पाकी तुम्हें अपनी मस्जिद के करीब कर देंगी इन्शा अल्लाह तआला*
*नमाज़ पढ़ो नमाज़ कायम करो अपने इमामो के साथ खुलूस और अख्लाक से पैस आओ*
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