*【POST 132】ग़ैर ज़रूरी जाहिलाना सवालात*

_आजकल अवाम में सवालात मालूम करने का रिवाज़ भी आम हो गया है वह भी अमल व इस्लाह की गरज़ से नहीं बल्कि उलमा को आज़िज़ करने या किसी फ़ासिद मक़सद से।_

*_एक साहब को मैंने देखा कि वह मालदार हो कर कभी कुर्बानी नहीं करते थे और मौलवी साहब से मालूम कर रहे थे हज़रते इस्माईल अलैहिस्सलाम की जगह जिबह करने के लिए जो दुम्बा लाया गया था वह नर था या मादा और उसका गोश्त किसने खाया था वहीं उन्हीं के जैसे दूसरे साहब बोले कि वह दुम्बा अन्डुआ था या खस्सी?_*

_एक साहब को नमाज़ याद नहीं थी और कुछ भी ठीक से करना नहीं जानते थे और उन्हें जो मौलाना साहब मिलते उनसे यह ज़रूर पूछते थे कि मूसा अलैहिस्सलाम की मां का क्या नाम था? और हज़रते खदीजा रदियल्लाह तआला अन्हा का निकाह किस ने पढ़ाया था?_

*_ग़रज़ कि इस किस्म के ग़ैर ज़रूरी सवालात करने का माहौल बन गया है। अवाम को चाहिए कि तारीख़ी बातों में न पड़ कर नमाज़, रोज़ा वगैरा अहकामे शरअ सीखें और इस्लामी अक़ीदे मालूम करें यही चीज़ें अस्ल इल्म हैं।_*

_और जो बात क़ुरआन व हदीस फ़िक़्ह से मालूम हो जाए तो ज़्यादा कुरेद और बारीकी में न पड़ें न बहस करें अगर अक्ल में न आए तो अक्ल का कुसूर जाने न कि मआज़ल्लाह क़ुरआन व हदीस का या फुक़हाए मुजतहिदीन का_

*_और ख़्वाहम ख़्वाह ज़्यादा सवालात करने की आदत अच्छी नहीं है। फ़ी ज़माना अमल करने का रिवाज़ बहुत कम है पूछने का ज़्यादा और अन्धा होकर बारीक राहों पर चलने में सख्त ख़तरा है।_*

📚 *गलत फ़हमियाँ और उनकी इस्लाह सफहा,138 139*

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