*【POST 29】नमाज मे इमाम के लिए लाउडस्पीकर का इस्तमाल*

          *नमाज़े बाजमाअत मे इमाम के लिए लाउडस्पीकर के इस्तेमाल का रिवाज आम होता जा रहा है। और लोगो ने नमाज़े बाजमाअत मे इमाम लिए जबाब के पहलू भी तैयार कर लिये और बहस व मुबाहिसे के जरिए अपने आराम का रास्ता ढूंढ लिया। और यह भी न सोचा कि नमाज़ का इस्लाम मे क्या मकाम है। बेशक नमाज़ इस्लाम की पहचान है। बेशक नमाज़ जाने इस्लाम रूहे इस्लाम अलामते अहले इमान है। बेशक नमाज़ पैगम्बरे। इस्लाम की आँखो की ठन्डक है  और उनके मुबारक दिल का आराम है। तो कम से कम इस अहम इस्लामी फरीजे और ऐसी इबादत को जिसमे बन्दा हर हाल से ज्यादा अपने रब से करीब होता है। साइन्सी ईजादात और जदीद टेक्नालॉजी के हवाले न करके उस अन्दाज़ पर रहने दीजिये जैसा कि जमानए पाके रसूले गिरामी वकार अलैहिस्सलातु वस्सलाम मे होती थी मगर अफसोस सद अफसोस नमाज़ मे लोगो ने लाउडस्पीकर का इस्तमाल करके जमानए नबवी की यादो को भुला दिया। लम्बी लम्बी कतारों मे मुकब्बिरो की गूंजती हुई अल्लाहु अकबर की सदाओ को ख्वाबे देरीना बना दिया।*

             _जदीद तहकीकात सै भी यह बात खूब जाहिर हो चुकी है। लाउडस्पीकर से निकलने वाली आवाज़ इमाम की अस्ल आवाज़ नही होती। तो जाहिर है। कि जो लोग उस ख़ारिजी आवाज़ पर इक्तिदा करते हैं। उन सब की नमाज़ ख़राब हो जाती है। कभी कभी दरमियान मे लाउडस्पीकर बन्द हो जाता है। और उसी पर भरोसा करके उसके आशिकों ने मुकब्बिरो का इन्तजाम भी किया होता है। तो नमाज के साथ खिलवाड़ हो कर रह जाता है। मगर माइक्रोफोन के दीवानों को इस सबसे क्या मतलब उनके नजदीक ज्यादा लोगो को नमाज़ पढ़ाने के लिए सेवाएं लाउडस्पीकर के और कोई ज़रिया ही नही रह गया है।_

          *_सही बात यह है कि जिन उलमा ने नमाज़ मे लाउडस्पीकर के इस्तेमाल को नाजाइज करार दिया उन्होने नमाज़ की शान को बाक़ी रखा उसके मकाम को समझा और जिन्होंने छूट दे दी उन्होंने नमाज़ की अहमियत को ही नही समझा और वह मौलवी होकर भी नमाज़ की लज्जत से नाआशना और उसकी बरकतो हिकमतो से महरूम रहे।_*

📚 *(गलत फहमियाँ और उनकी इस्लाह सफहा, 33 34)*

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