*【POST 28】नमाजी के सामने से गुजरना मना है हटना गुनाह नहीं*

         आमतौर से मस्जिदों में देखा गया है। कि दो शख्स आगे पीछे नमाज पढ़ते हैं यानी एक पिछली सफ मे और दूसरा उसके सामने अगली सफ में नमाज़ पढ़ने वाला पीछे वाले से पहले फारिग हो जाता है। और फिर उसकी नमाज़ ख़त्म होने का इन्तजार करता रहता है। कि वह सलाम फेरे तब यह वहाँ से हटे और इससे पहले हटने को नमाजी के सामने से गुजरना ख़्याल किया जाता है। हालांकि ऐसा नही है।आगे नमाज़ पढ़ने वाला अपनी नमाज़ पढ़ कर हट जाए तो उस पर गुजरने का गुनाह नही है।

        *खुलासा यह कि नमाजी के सामने से गुजरना मना है। हटना मना नही है। सदरूश्शरीआं हजरत मौलाना अमजद अली साहब आज़मी अलैहिर्रहमह फरमाते है।*

       " अगर दो शख्स नमाजी के सामने से गुजरना गुजरना चाहते हों और सुतरह को कोई चीज़ नही तो उन मे से एक नमाजी के सामने उसकी तरफ़ पीठ करके खड़ा हो जाए और दूसरा उसकी आड़ पकड़ के गुजर जाए। फिर वह दूसरा उसकी  पीठ के पीछे नमाजी की तरफ पुश्त करके खड़ा हो जाए और गुजर जाए वह दूसरा जिधर से आया उसी तरफ हट जाए" ।

📗 *(आलमगीरी, रद्दुलमुहतार, बहारे शरीअत, हिस्सा सोम सफहा 159)*

          *इससे जाहिर है। कि गुजरने और हटने मे फर्क है। और गुजरने का मतलब यह है। कि नमाजी के सामने एक तरफ से आए और दूसरी तरफ़ निकल जाए यह यकीनन नाजाइज व गुनाह है। और आखर नमाज़ी के सामने बैठा है। और किसी तरफ़ हट जाए तो यह गुजरना नही है। और इससे कोई गुनाह नही।*

अगर नमाजी के सामने से गुजरने का गुनाह इन्सान को पता चल जाए तो उसकी रूह काप जाए अक्सर जुमआ कि नमाज के लिए मस्जिदों मे देखा जाते है। लोग आते है। और पीछे की शफ मे बैठ जाते है। जिनकी बजह से आगे बाली सफे खाली रहती है। फिर बाद मे आने बाले लोग उन्हें नाक कर आगे की तरफ जाते है। यह भी गुनाह है। बल्कि मस्जिद मे जो शख्स सबसे पहले आता है। अल्लाह के फरिश्ते उसकी सबसे पहले आने की बात को लिख लिया करते है। और उसका सबाब उसे अता किया जाता है। जो दूसरे तीसरे चौथे बारी-बारी आते जाते है। अल्लाह के फरिश्ते लिखते जाते है। फलाह शख्स इतने नम्बर पर फला शख्स इतने नम्बर पर इसका सबाब अल्लाह उन्हें अता करता है। जो शख्स सबसे पहली सफ मे आकर बैठता है। अल्लाह उसे एक ऊँट करबानी करने ह का सबाब अता करता है। और जो दूसरी सफ मे बैठ ता है। उसे एक भैंस का सबाब और जो तीसरी शफ मे बैठता है। उसे एक बकरे का सबाब इसी तरह बारी बारी सबाब कमता जाता है। जेसे ही खुतवा यानी दूसरी अजान का टाइम हो जाता है। बेसे ही फरिश्ते लिखना बन्द कर देते है। और ब अदब खुतबा सुनते है। क्यूँ कि खुतवा सुनना वाजिब है। आपने देखा खुतवा को फरिश्ते भी अदब के साथ बैठ कर सुनते है। लेकिन हम लोग खुतवे के दौरान बातो मे मसगूल रहते है। जो शख्स खुतवा नही सुनता है। वह अल्लाह की रहमत से महरूम रहता है। और गुनहगार होता है।

📚 *गलत फ़हमियाँ और उनकी इस्लाह सफहा, 32*

*अल्लाह रब्बुल इज्जत अपने हबीब सल्लल्लाहो तआला अलह वसल्लम के सदके कहने सुनने से ज्यादा अमल की तौफीक अता फरमाए*

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