*【POST 70】क्या नापाक रहनें से रोज़ा टूट जाता है।*

          अगर कोई शख़्स रोज़ा रखकर दिन मे नापाक रहें और इस नापाकी की वजह से उसकी नमाज़ छूटती है। तो उसके ऊपर नमाज़ छोड़ने का गुनाहे अज़ीम होगा क्यूँकी फ़र्ज नमाज़ छोड़कर इस्लाम मे बड़ा गुनाह है। अंर जहन्नम का रास्ता है।

        लेकिन इस नापाकी का उसके रोज़े पर कोई असर नहीं पड़ेगा यअनी रोज़ा हो जायेगा। यह ख़्याल करना कि नापाकी की हालत मे रोज़ा नही होंगा, ग़लतफहमी है। पाक रहना नमाज़ के लिए शर्त है। रोज़े के लिए नही चाहे दिन भर नापाक रहे तब भी रोज़ा बाक़ी रहेंगा लेकिन यह नापाक रहना मोमिन की शान नहीं क्यूँकी इस तरह नमाज़े क़ज़ा होंगी।

     अहादीश करीमा की रोशनी मे इस मसअले की तहक़ीक व तफ़सील जिसे देखना हो वह

📗 *(फ़तावा रज़विया जिल्द 4 सफ़हा 615 को देखे)*
📚 *गलत फ़हमियाँ और उनकी इस्लाह सफहा, 72*
             खुलासा यही है। नापाक रहने से भी रोज़ा मे कोई फर्क नही होंगा लेकिन मोमिन की यह शान नही के वह नापाक रह कर रोज़े रखे मुसलमान थो और इस्लाम तो पाकी का नाम है। जिसको देख कर गैर क़ौम भी हमसे इबरत हासिल करती है। हमारी पाकी का डंका तो पूले जहान मे बजता है। फिर क्यूँ हम इतने पाक मुकद्दश महीने के रोज़ो को नापाक रहकर रखें।

*रोजे रखना हर मुसलमान मर्द औरत बालिग बच्चों पर फ़र्ज है। लेकिन कुछ हमारे भाई माँ बहिने मज़बूरी के चलते रोज़ा छोड़ देते है। उनकों यह मालूम होना चाहिएं यह रोज़े अल्लाह ने हम पर फ़र्ज किए है। अगर मज़बूरी मे हमने रोज़े को छोड़ा है। तो इसका कफ्फारा भी करना होगा रमज़ान के बाद इसके रोज़ो का कफ्फारा करने के लिए अपने पास के उलमा से ऱूज़ू करे और सही तरीके रोज़े का कफ्फारा अदा करे।*

मोमनो शहरी खाया करो चाहे एक लुक्मा क्यूँ ना खाओ यह *प्यारे आक़ा सल्लल्लाहो तआला अलह वसल्लम* की सुन्नत मुबारका है। इससे महरूम मत रहा करों कुछ हमारे भाई है। जो बगैर शहरी का रोज़ा रहकर चारो तरफ सुनाते है। आज हम बगैर शहरी का रोज़ा है। ऐसा करनें बालो इबरत हासिल करना चाहिए एक तो *अल्लाह* अपने *प्यारे महबूब सल्लल्लाहो तआला अलह वसल्लम* की अज़ीम सुन्नत से महरूम किया उनको सोचना चाहिएं *अल्लाह* हमने ऐसी कोंन सी खता या ग़लती हुई जिसकी बजह से *परबरदिगार* ने हमे इतनी अनमोल और कीमती सुन्नत से महरूम रखा उस ग़लती के लिए *अल्लाह तआला* से सिद्के दिल से तौबा करे और माफ़ी तलब करे *अल्लाह तआला* को तौबा करने बाला बहुत पसंद है। दूसरी ग़लती जो सुनाता फिरता है। मेने शहरी नही की बह अपने रोज़े की नुमाइस करता है। और रिंया कारी करता है। जो *अल्लाह तआला* को सबसे ज्यादा न पसन्द है। फेसला आपके हाथ मे *अल्लाह तआला* रजा मे राज़ी होना है। या अपने दिखाबे मे खुश होना है। करलो तौबा अभी रहमत बरसती है। माँग लो रों कर ख़ुदा से अपनी निज़ात मग़फिरत अल्लाह आपने बन्दो को महरूम न करेगा।

*आप सभी हजरात इस गुनाहगार को अपनी ख़ास दुआओं मे याद रखें अल्लाह तआला आपकी हर नेक दुआओं को आपके रोज़ा नमाज़ो को अपनी बारगाह मे कुबूल करें।*
*आमीन सुम्मा आमीन या रब्बुल आलमीन*

No comments:

Post a Comment

Our Social Sites