POST 06

*_﷽-الصــلوة والسلام‎ عليك‎ ‎يارسول‎ الله ﷺ_*
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 《[इस्लामी हैरत अंगेज़ मालूमात पोस्ट(59)]》
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    *《हुज़ूर नबी-ए-करीमﷺका बयान》*
             *《पोस्ट (06)》*
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सवाल- हुज़ूर नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु त‌आला अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया मैं दो ज़बीहों का बेटा हूं‌‌ यह दो जबीह के मिस्दाक कौन कौन हैं?
*जवाब- दो ज़बीहों से मुराद एक तो हज़रत इस्माईल अलैहिस्सलाम हैं जिनकी में से आप हुज़ूर नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु त‌आला अलैहि वसल्लम हैं दुसरे ज़बीह आपके वालिदे माजिद हज़रत अब्दुल्लाह बिन अब्दुल मुत्तलिब हैं उनका ज़बीह नाम के साथ मौसू होने का वाक़िआ अस्हाबे अहादीस व मौर्रिख यूं बयान करते हैं{वाक़िआ}कौम जरहम जब मक्का से भाग खड़ी हुई और यमन की जानिब चली गई तो भागते भागते इब्ने अमरु बिन हारिस ने जो कौम का हाकिम था हजरे असवद को रुकने काबा से उखाड़ कर दो सोने की मुर्तियां को जो सोने व जवाहरात से जड़ी हुई थीं और चंद हथियार जो खाना-ए-काबा में थे सब को ज़म-ज़म के कुंए में छिपाकर उसे पाट दिया और जगह को ज़मीन के बराबर कर दिया धीरे धीरे उसका मुकाम और जगह भी किसी को याद नहीं रही ज़म-ज़म के कुंए का सिर्फ तजकिरा ही तज़किरा लोगों की ज़बान पर रह गया था और ज़म-ज़म का कुंआ उससी दिन से गुम और वेनिशान रहा अल्लाह त‌आला का इरादा जब ज़म-ज़म के कुंए को ज़हीर करने का हुआ तो अल्लाह त‌आला ने हज़रत मुत्तलिब को ख़्वाब में ज़म-ज़म के कुंए का मुकाम दिखाकर हुक्म दिया कि उससे ज़हीर करो हज़रत मुत्तलिब रज़ियल्लाहु त‌आला अन्हु ने जब हुक्मे इलाही को पूरा करने के लिए ज़म-ज़म के कुंए को खोदना चाहा तो कौमे कुरैश आड़े आई और लड़ने को तैयार हो गई क्योंकि ज़म-ज़म के कुंए की जगह दो बुत नसब थे जिनका नाम असाफ़ और नाएला था और कुरैश नहीं चहाते की बुतों कि जगह कुंआ खोदा जाए यह सिर्फ दो ही बाप बेटे थे हज़रत अब्दुल मुत्तलिब रज़ियल्लाहु त‌आला अन्हु और आपका एक बेटा हारिस और सिवाय अल्लाह त‌आला के कोई उनका मद्दगार व साथ देने वाला न था फिर यह गालिब हुए और कुंआ खोदने के काम में मशगूल हो गए और उससी वक़्त हज़रत अब्दुल मुत्तलिब रज़ियल्लाहु त‌आला अन्हु ने अपनी तन्हाई को महसूस किया और दुआ कि अगर अल्लाह त‌आला मुझको दस बेटे अता करे और चश्मा भी निकल आए तो में अपने एक बेटे की अल्लाह त‌आला की बारगाह में कुर्बानी कर दुंगा लिहाजा कुछ रोज़ कि महनत के बाद चश्मा भी निकल आया और फिर अल्लाह त‌आला ने हज़रत अब्दुल मुत्तलिब को दस बेटे भी अता किये ज़म-ज़म के कुंए को निकल आने की वज़ह से कुरैश हज़रत अब्दुल मुत्तलिब रज़ियल्लाहु त‌आला अन्हु की इज़्ज़त व मंजिलत दोबाला हो गई सब उनकी बुज़ुर्गी और सरदारी के कायल हो ग‌ए जब हज़रत अब्दुल मुत्तलिब रज़ियल्लाहु त‌आला अन्हु के सब बेटे बुगूल की हद को पहुंचे तो उन्होंने अपनी मानी हुई मन्नत पूरी करनी चाही और अपने तमाम बेटों को जमा करके तमाम हाल बयान किया और तमाम बेटों ने एक ज़बान होकर कहा आपको इख्तियार है अगर आप हम सब कि कुर्बानी देने पर राज़ी हैं तो हम सब तैयार हैं हज़रत अब्दुल मुत्तलिब रज़ियल्लाहु त‌आला अन्हु को अपने बेटों की यह इताअत और स‌आदतमंदी बहुत भली मालूम हुई और फ़रमाया पर्ची डालो जब पर्ची डाली गई तो इत्तिफाक कि बात कि कुर्रे का तीर सबसे छोटे बेटे हज़रत अब्दुल्लाह रज़ियल्लाहु त‌आला अन्हु के नाम निकला हज़रत अब्दुल्लाह अपने वालिद के नज़दीक बहुत महबूब और प्यारे थे क्योंकि आपकी पेशानी में हुज़ूर नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु त‌आला अलैहि वसल्लम ताबां रौशन था और वह साहब हुस्न व जमाल बड़े बहादुर पहलवान और तीर‌अंदाज थे इसके बावजूद हज़रत अब्दुल मुत्तलिब रज़ियल्लाहु त‌आला अन्हु हज़रत अब्दुल्लाह को लेकर कुर्बानगाह की तरफ़ चले हज़रत अब्दुल्लाह के तमाम भाईयों बहनों रिश्तेदारों और कुरैश के सरदारों ने हज़रत अब्दुल मुत्तलिब रज़ियल्लाहु त‌आला अन्हु को हज़रत अब्दुल्लाह को ज़िब्हा करने से रोकना चाहा मगर हज़रत अब्दुल मुत्तलिब रज़ियल्लाहु त‌आला अन्हु नहीं माने आखिर बड़ी खेंचतान के बाद के यह मामला सजा नामी काहिना कि तरफ़ रुजू किया गया जो हज़्ज़ाज में तमाम काहिनो में दाना और अक़्लमद थी तमाम माजरा सुन्ने के बाद उस काहिना औरत ने कहा तुम्हारे हिया एक आदमी का खून बहा दस ऊंट हैं बस तुम एक तरफ दस ऊंट को रखो और एक तरफ अब्दुल्लाह को रखो और कुर्रा डालो अगर कुर्रा ऊंटों के नाम निकल आए तो ऊंटों की कुर्बानी दे दो और अगर अब्दुल्लाह के नाम से निकल आए तो दस ऊंट और बड़ाकर बीस ऊंट अब्दुल्लाह के मुकाबले रखो और फिर कुर्रा डालो इसी तरह हर मर्तबा दस दस ऊंट बढ़ाते जाओ यहां तक कि कुर्रा ऊंटों के नाम पर निकल आए लिहाजा ऐसा ही किया गया और कुर्रा अब्दुल्लाह के नाम से ही निकलता रहा यहां तक कि ऊंटों की तादाद सौ हो गई तो ऊंटों के नाम पर कुर्रा निकला हज़रत अब्दुल मुत्तलिब रज़ियल्लाहु त‌आला अन्हु ने अपनी तसल्ली के लिए दोबारा फिर कुर्रा डाला और अब हर मर्तबा ऊंटों के नाम ही कुर्रा निकलता हज़रत अब्दुल मुत्तलिब रज़ियल्लाहु त‌आला अन्हु ने अल्लाह त‌आला का शुक्र अदा किया और हज़रत अब्दुल्लाह रज़ियल्लाहु त‌आला अन्हु ने ज़िब्ह से खुलासी पाई इसके बाद सौ ऊंटों को ज़िब्ह करके ख़ास व आम और दरिंदों और परिंदों को खिलाया गया फिर अरब में एक शख्स की द‌इय्यत सौ ऊंट मुकर्रर हो गई हालांकि उससे पहले दस ऊंट मुकर्रर थी।*
(मदारिज़नबुव्वत 2/16,17/तवारिख़ुल हवीब 9)
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*हदीसे पाक में है कि इल्म फैलाने वाले के बराबर कोई आदमी सदक़ा नहीं कर सकता।*
(क़ुर्बे मुस्तफा,सफ़्हा100)
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