*_﷽-الصــلوة والسلام عليك يارسول الله ﷺ_*
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《[इस्लामी हैरत अंगेज़ मालूमात पोस्ट(60)]》
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*《हुज़ूर नबी-ए-करीमﷺका बयान》*
*《पोस्ट (07)》*
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सवाल- हुज़ूर नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की मुहरे नबुव्वत जिस्म मुबारक के किस हिस्से में थी और उस मुहर की शक्ल व सुरत कैसी थी?
*जवाब- हुज़ूर नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के दोनों कंधों के बीच मुहरे नबुव्वत थी मुहरें नबुव्वत एक ऐसी उभरी हुई चीज थी जो हमरंग बदन मुशाबह जस्दे अतहर और साफ नूरानी थी रावियों ने मुहरें नबुव्वत की सुरत व शक़्ल का भी जिक्र किया और समझाने के लिए तश्बीह इस्तेमाल कि है लिहाज़ा किसी ने इसे कबूतर के अंडे से और किसी ने सुर्ख़ ग़ुदूद"गोश्त की सख़्त गिरह"से जो आमतौर पर जिस्म पर होता है तश्बीह दी है मुराद यह है कि ग़ुदूद के तरह और सुर्ख़ से लाली की तरफ माइल है लिहाज़ा यह उस रिवायत से मुनाफी नहीं जिसमें कहा गया है कि मुहरें नबुव्वत का रंग जिस्मे अतहर के रंग के हमरंग था बल्कि इससे उस कौल का रद्द करना मकसूद था जिसमें है कि उसका रंग स्याह व सब्ज़ था और एक रिवायत में है कि मुहरें नबुव्वत ज़र्र हजला की मानिन्द ज़र्र बमानी तकमा"घुंडी"जो पैरहन के गिरेबान में होता है और हजला बमानी वह गोशा जहां दुल्हन को बिठाया जाता है बाज़ कहते हैैं कि हजला एक मशहूर परिन्दा और ज़र्र उसका अंडा है यह उस हदिस के मुवाफिक है जिसमें कहा गया है कि मुहरें नबुव्वत कबूतर के अंडे के मानिन्द थी और तिर्जिमी शरीफ़ की एक और हदीस में है कि मुहरें नबुव्वत गोश्त का एक टुकड़ा था एक और हदीस में मुश्त की मानिन्द आया है जिसमें सालैल की मानिन्द थे सालैल उन दोनों को कहते हैैं जो जिल्द के नीचे चने के दाने की मानिंद निकल आते हैं यह सब कुछ मुहरें नबुव्वत की जाहिरी शक़्ल व सुरत के बारे में था लेकिन उसके पिछे अल्लाह तआला का अज़ीम असर कार फ़रमान है जो हुज़ूर नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के साथ मख़्सूस है जो किसी और नबी को हासिल नहीं हुआ।*
(मदारिज़ नबुव्वत 1/36,37)
सवाल- हुज़ूर नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की मुहरें नबुव्वत पर क्या लिखा था?
*जवाब- शेख़ इब्ने हजर मक्की रहमतुल्लाह तआला अलैहि शरह मिश्कात में फरमाते हैं आपकी मुहरें नबुव्वत में लिखा हुआ था"अल्लाहु वहादहु लाशारिका लहु तवज़्ज़हु हएसु कुन्ता फा इन्नाका मन्सुर"और हज़रत अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ियल्लाहु तआला अन्हु के मुताबिक मुहरें नबुव्वत पर"ला इलाहा इल्लल्लाह"के अल्फ़ाज लिखे हुए थे और एक रिवायत के मुताबिक"मुहम्मदुर्ररसूलल्लाह"के अल्फ़ाज थे।*
(मदारिज़ नबुव्वत 1/36/शवाहिद नबुव्वत 251)
सवाल- हुज़ूर नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के विसाले हक़ के बाद मुहरें नबुव्वत बाकी रही थी या नहीं?
*जवाब- बाज़ रिवायतों में आया है कि आप हुज़ूर नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के विसाले हक़ के बाद मुहरें नबुव्वत रूपोश हो गई थी और इसी अलामत से मालूम हुआ कि हुज़ूर नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने पर्दा फ़रमाया है क्योंकि लोगों में शुब्हा और इख़्तिलाफ वाक़ेअ हो गया था या इसलिए कि यह दलीलें नबुव्वत थी अब इसके इस बात की हाजत नहीं रही या फिर इस बात के कि अल्लाह तआला का कोई ख़ास भेद हो जिसे वह खुब जानता है लेकिन यह ग़लत है कि बाद विसाल नबुव्वत बाकी न रही क्योंकि नबुव्वत व रिसालत मौत के बाद भी बरक़रार रहती है।*
(मदारिज़ नबुव्वत 1/36)
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*हदीसे पाक में है कि इल्म फैलाने वाले के बराबर कोई आदमी सदक़ा नहीं कर सकता।*
(क़ुर्बे मुस्तफा,सफ़्हा100)
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《[इस्लामी हैरत अंगेज़ मालूमात पोस्ट(60)]》
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*《हुज़ूर नबी-ए-करीमﷺका बयान》*
*《पोस्ट (07)》*
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सवाल- हुज़ूर नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की मुहरे नबुव्वत जिस्म मुबारक के किस हिस्से में थी और उस मुहर की शक्ल व सुरत कैसी थी?
*जवाब- हुज़ूर नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के दोनों कंधों के बीच मुहरे नबुव्वत थी मुहरें नबुव्वत एक ऐसी उभरी हुई चीज थी जो हमरंग बदन मुशाबह जस्दे अतहर और साफ नूरानी थी रावियों ने मुहरें नबुव्वत की सुरत व शक़्ल का भी जिक्र किया और समझाने के लिए तश्बीह इस्तेमाल कि है लिहाज़ा किसी ने इसे कबूतर के अंडे से और किसी ने सुर्ख़ ग़ुदूद"गोश्त की सख़्त गिरह"से जो आमतौर पर जिस्म पर होता है तश्बीह दी है मुराद यह है कि ग़ुदूद के तरह और सुर्ख़ से लाली की तरफ माइल है लिहाज़ा यह उस रिवायत से मुनाफी नहीं जिसमें कहा गया है कि मुहरें नबुव्वत का रंग जिस्मे अतहर के रंग के हमरंग था बल्कि इससे उस कौल का रद्द करना मकसूद था जिसमें है कि उसका रंग स्याह व सब्ज़ था और एक रिवायत में है कि मुहरें नबुव्वत ज़र्र हजला की मानिन्द ज़र्र बमानी तकमा"घुंडी"जो पैरहन के गिरेबान में होता है और हजला बमानी वह गोशा जहां दुल्हन को बिठाया जाता है बाज़ कहते हैैं कि हजला एक मशहूर परिन्दा और ज़र्र उसका अंडा है यह उस हदिस के मुवाफिक है जिसमें कहा गया है कि मुहरें नबुव्वत कबूतर के अंडे के मानिन्द थी और तिर्जिमी शरीफ़ की एक और हदीस में है कि मुहरें नबुव्वत गोश्त का एक टुकड़ा था एक और हदीस में मुश्त की मानिन्द आया है जिसमें सालैल की मानिन्द थे सालैल उन दोनों को कहते हैैं जो जिल्द के नीचे चने के दाने की मानिंद निकल आते हैं यह सब कुछ मुहरें नबुव्वत की जाहिरी शक़्ल व सुरत के बारे में था लेकिन उसके पिछे अल्लाह तआला का अज़ीम असर कार फ़रमान है जो हुज़ूर नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के साथ मख़्सूस है जो किसी और नबी को हासिल नहीं हुआ।*
(मदारिज़ नबुव्वत 1/36,37)
सवाल- हुज़ूर नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की मुहरें नबुव्वत पर क्या लिखा था?
*जवाब- शेख़ इब्ने हजर मक्की रहमतुल्लाह तआला अलैहि शरह मिश्कात में फरमाते हैं आपकी मुहरें नबुव्वत में लिखा हुआ था"अल्लाहु वहादहु लाशारिका लहु तवज़्ज़हु हएसु कुन्ता फा इन्नाका मन्सुर"और हज़रत अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ियल्लाहु तआला अन्हु के मुताबिक मुहरें नबुव्वत पर"ला इलाहा इल्लल्लाह"के अल्फ़ाज लिखे हुए थे और एक रिवायत के मुताबिक"मुहम्मदुर्ररसूलल्लाह"के अल्फ़ाज थे।*
(मदारिज़ नबुव्वत 1/36/शवाहिद नबुव्वत 251)
सवाल- हुज़ूर नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के विसाले हक़ के बाद मुहरें नबुव्वत बाकी रही थी या नहीं?
*जवाब- बाज़ रिवायतों में आया है कि आप हुज़ूर नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के विसाले हक़ के बाद मुहरें नबुव्वत रूपोश हो गई थी और इसी अलामत से मालूम हुआ कि हुज़ूर नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने पर्दा फ़रमाया है क्योंकि लोगों में शुब्हा और इख़्तिलाफ वाक़ेअ हो गया था या इसलिए कि यह दलीलें नबुव्वत थी अब इसके इस बात की हाजत नहीं रही या फिर इस बात के कि अल्लाह तआला का कोई ख़ास भेद हो जिसे वह खुब जानता है लेकिन यह ग़लत है कि बाद विसाल नबुव्वत बाकी न रही क्योंकि नबुव्वत व रिसालत मौत के बाद भी बरक़रार रहती है।*
(मदारिज़ नबुव्वत 1/36)
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*हदीसे पाक में है कि इल्म फैलाने वाले के बराबर कोई आदमी सदक़ा नहीं कर सकता।*
(क़ुर्बे मुस्तफा,सफ़्हा100)
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