*अक्सर औरतो मे यह रिवाज है। कि बच्चा पैदा होने के बाद जब तक चिल्ला पूरा न हो। चाहे खून आना बन्द हो गया हो न नमाज पढ़े न रोज़ा रखें और न अपने को नमाज के लायक जाने यह महज जहालत है। जब निफास यानी खून आना बन्द हो जाए उसी वक़्त से नहा कर नमाज शुरू करदे। और अगर नहाना नुकसान करे तो तयम्मुम करके नमाज पढ़े। यानी निफास की मुद्दत चालीस दिन जरूरी ख़्याल करना गलतफहमी है। जब तक ख़ून आए तभी तक औरत निफास मे मानी जाएगी ख्वाह चन्द दिन ही हुए हो। हां अगर चालीस दिन गुजरने के बाद भी ख़ून आना बन्द न हो तो चालीस दिन के बाद नहा कर नमाज पढ़ेगी और जिन दिनो मे उस पर नमाज रोजा फ़र्ज है उन दिनों मे शौहर और बीवी का हमबिस्तर होना भी जाइज है।*
खुलाशा यह है। खास कर कम इल्म बाले लोग ऐसी हरकत करने से बाज नही आते है। आज के दौर भे बेसे भी देखा जाता है। मर्द हो चाहे औरत सबने नमाज को तर्क कर दिया है। जेसे तेसे हमारी कुछ बहिने नमाज को पढ़ना फर्जेएन समझती है। तो कुछ कम इल्म वाले उनको इस मुद्दत मे नमाजे तर्क करवाने मे नही चूकते नजर आते है। आपको बता दू नमाज किसी भी हाल मे माफ नही है। अगर खुद नमाज की अहिमयत नही समझती तो कम से कम अपनी बेटी और बहू को तो मत रोको हो सके तो उनको देख कर खुद भी अल्लाह की बारगाह मे हाथ फैलाना चालू करदो इससे पहले की तुम्हारी या हमारी नमाज पढ़ी जाए
*दुआ है। रब तबारक तआला से हम सबको दीन की सही समझ अता फरमा और हम सबको हमारी माँ बहनो को सच्चा पक्का नमाजी बनाए*
📚 *गलत फ़हमियाँ और उनकी इस्लाह सफहा, 22 23*
खुलाशा यह है। खास कर कम इल्म बाले लोग ऐसी हरकत करने से बाज नही आते है। आज के दौर भे बेसे भी देखा जाता है। मर्द हो चाहे औरत सबने नमाज को तर्क कर दिया है। जेसे तेसे हमारी कुछ बहिने नमाज को पढ़ना फर्जेएन समझती है। तो कुछ कम इल्म वाले उनको इस मुद्दत मे नमाजे तर्क करवाने मे नही चूकते नजर आते है। आपको बता दू नमाज किसी भी हाल मे माफ नही है। अगर खुद नमाज की अहिमयत नही समझती तो कम से कम अपनी बेटी और बहू को तो मत रोको हो सके तो उनको देख कर खुद भी अल्लाह की बारगाह मे हाथ फैलाना चालू करदो इससे पहले की तुम्हारी या हमारी नमाज पढ़ी जाए
*दुआ है। रब तबारक तआला से हम सबको दीन की सही समझ अता फरमा और हम सबको हमारी माँ बहनो को सच्चा पक्का नमाजी बनाए*
📚 *गलत फ़हमियाँ और उनकी इस्लाह सफहा, 22 23*
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