*अज़ान के वक़्त बातों मे मशगूल रहना एक आम बात हो गई है। अवाम तो अवाम बाज़ खवास अहले इल्म तक इसका ख़्याल नही रखते जब कि हदीस शरीफ मे है।*
जो अज़ान के वक़्त बातों मे मशगूल रहे उस पर खात्मा बुरा होने का खौफ है।
*मसअला यह है। कि जब अज़ान हो तो उतनी देर के लिए न सलाम करे न सलाम का जबाब दे न कोई और बात करे यहाँ तक की कुर्आन मजीद की तिलावत मे अगर अज़ान कि आवाज़ आए तो तिलावत रोक दे और अज़ान गौर से सुने और जबाब दे रास्ता चलने अगर अज़ान की आवाज़ आए तो उतनी देर खड़ा हो जाए सुने और जबाब दे अगर चन्द अजाने सुने तो सिर्फ़ पहली का जबाब देना सुन्नत है। और सबका देना भी बहतर है।*
📚 *गलत फ़हमियाँ और उनकी इस्लाह सफहा, 29*
खुलासा यही है। अगर अज़ान हो तो बहतर यही है। खमोसी से उसका जबाब दिया जाए अगर अजान के वक़्त बन्दा बातो मे मसगूल रहता है। तो अल्लाह उसको अजाब देता है। यहा तक हदीसो मे आया है। जो अज़ान को जान बूझकर न सुनता होगा उसको मरते वक्त कलमा नसीब नही होगा जब अल्लाह तआला अज़ान के वक़्त कुर्आन की तिलावत बन्द करने का हुक्म देता है।
*तो अए इन्सान तुम्हारी बाते कुर्आन कि तिलावत से भी बड़ी हो गई क्या अरे अज़ान कि अहमियत तो वह है। जब अज़ान सुरू हो जाए तो तवाफे काबा भी रूक जाए अए इन्सान तू अपने दो कदम रक कर अल्लाह के कलाम को नही सुन सकता अज़ान का मकाम क्या है। यह हमे मालूम होना चाहिऐ बहतर यही है। जब भी अज़ान सुनो अपने हर काम को रोक दो चाहे कितना भी बड़ा काम हो अज़ान से बढ़कर नही हो सकता है। ब गौर सुनकर जबाब भी दिजिए। और सबाब के मुस्तहब बने।*
जो अज़ान के वक़्त बातों मे मशगूल रहे उस पर खात्मा बुरा होने का खौफ है।
*मसअला यह है। कि जब अज़ान हो तो उतनी देर के लिए न सलाम करे न सलाम का जबाब दे न कोई और बात करे यहाँ तक की कुर्आन मजीद की तिलावत मे अगर अज़ान कि आवाज़ आए तो तिलावत रोक दे और अज़ान गौर से सुने और जबाब दे रास्ता चलने अगर अज़ान की आवाज़ आए तो उतनी देर खड़ा हो जाए सुने और जबाब दे अगर चन्द अजाने सुने तो सिर्फ़ पहली का जबाब देना सुन्नत है। और सबका देना भी बहतर है।*
📚 *गलत फ़हमियाँ और उनकी इस्लाह सफहा, 29*
खुलासा यही है। अगर अज़ान हो तो बहतर यही है। खमोसी से उसका जबाब दिया जाए अगर अजान के वक़्त बन्दा बातो मे मसगूल रहता है। तो अल्लाह उसको अजाब देता है। यहा तक हदीसो मे आया है। जो अज़ान को जान बूझकर न सुनता होगा उसको मरते वक्त कलमा नसीब नही होगा जब अल्लाह तआला अज़ान के वक़्त कुर्आन की तिलावत बन्द करने का हुक्म देता है।
*तो अए इन्सान तुम्हारी बाते कुर्आन कि तिलावत से भी बड़ी हो गई क्या अरे अज़ान कि अहमियत तो वह है। जब अज़ान सुरू हो जाए तो तवाफे काबा भी रूक जाए अए इन्सान तू अपने दो कदम रक कर अल्लाह के कलाम को नही सुन सकता अज़ान का मकाम क्या है। यह हमे मालूम होना चाहिऐ बहतर यही है। जब भी अज़ान सुनो अपने हर काम को रोक दो चाहे कितना भी बड़ा काम हो अज़ान से बढ़कर नही हो सकता है। ब गौर सुनकर जबाब भी दिजिए। और सबाब के मुस्तहब बने।*
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