जब तकबीर कहने बाला *हय्या अलस्साह* और *हय्या अललफलाह* कहे इमाम और मुकतदी जो वहाँ मौजूद है। उनको उसी वक़्त खड़ा होना चाहिए। मगर कुछ जगह शुरू तकबीर से खड़े होने का रिवाज पड़ गया है। और वह लोग इस रिवाज पर इतने अड़ जाते है। कि हदीसो और फिक्ही किताबो की परवाह नही करते और मनमानी ज़िद और हटधर्मी से काम लेते है।
फतावा आलमगीरी जो बादशाह औरंगजेब आलमगीर रहमतुल्लाह तआला अलैह के हुक्म से तकरीबन साढ़े तीन सौ साल पहले उस दौर के तकरीबन सभी बड़े बड़े उलमा ने मसवरे के साथ लिखीं उसमे है।
*मोअज्जिन जिस वक़्त हय्या अललफलाह कहे तब इमाम और मुकतदियो को खड़ा होना चाहिए यही सही तरीका है।*
📗 *(फतावा आलमगिरी ज़िल्द 1 सफहा 58)*
जहा शरीअत हो वहा तरीकत नही काम आती यही कानून है। इस्लाम का जो कानून बना है। उसे त कयामत तक कोई भी पोस्ट नहीं मिटा सकता और जो मिटाने कि नमुमकिन कोसिस करेगा वह खुद तवाह हो जाएगा इसलिए इस्लाम मे इल्म सीखना फर्ज है। जब तक दीन की सही जानकारी नही होगी तब तक हम गुमराही और गुनाह करते नजर आते रहेगे
*अल्लाह हमे सही मायनो मै दीन की समझ अता फरमाए*
📚 *गलत फ़हमियाँ और उनकी इस्लाह सफहा, 30*
फतावा आलमगीरी जो बादशाह औरंगजेब आलमगीर रहमतुल्लाह तआला अलैह के हुक्म से तकरीबन साढ़े तीन सौ साल पहले उस दौर के तकरीबन सभी बड़े बड़े उलमा ने मसवरे के साथ लिखीं उसमे है।
*मोअज्जिन जिस वक़्त हय्या अललफलाह कहे तब इमाम और मुकतदियो को खड़ा होना चाहिए यही सही तरीका है।*
📗 *(फतावा आलमगिरी ज़िल्द 1 सफहा 58)*
जहा शरीअत हो वहा तरीकत नही काम आती यही कानून है। इस्लाम का जो कानून बना है। उसे त कयामत तक कोई भी पोस्ट नहीं मिटा सकता और जो मिटाने कि नमुमकिन कोसिस करेगा वह खुद तवाह हो जाएगा इसलिए इस्लाम मे इल्म सीखना फर्ज है। जब तक दीन की सही जानकारी नही होगी तब तक हम गुमराही और गुनाह करते नजर आते रहेगे
*अल्लाह हमे सही मायनो मै दीन की समझ अता फरमाए*
📚 *गलत फ़हमियाँ और उनकी इस्लाह सफहा, 30*
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