काफी लोग देखे गए वह नमाजो का ख्याल नहीं रखते और पढ़ते भी है। तो वक़्त निकाल कर जल्दी जल्दी या बे जमाअत के। और वजीफा और तस्बीहो मे लगे रहते है। उनके वजीफे उनके मुँह पर मार दिये जाएगे क्यूंकि जिसकी फर्ज पूरी न हो उसका कोई नफ्ल कबूल नही। इस्लाम मे सबसे बड़ा वजीफा और अमल नमाज़े बाजमाअत की अदाएगी है।
*(आला हजरत फरमाते है।)*
"जब तक फर्ज जिम्मे बाक़ी रहता है। कोई नफ्ल कबूल नही किया जाता।
📕 *(अलमलफूज, हिस्सा अव्वल, सफहा 77)*
हदीश शरीफ मे है। कि *हजरते उमर रदीअल्लाहो ताला अनहु* एक दिन फज्र की जमाअत मे *हजरते सुलेमान बिन अबी हसमा रदीअल्लाहो ताला अनहु* को नही पाया दिन मे बाज़ार जाते वक़्त उनके घर के पास से गुजरे तो उनकी माँ से पूँछा कि आज *सुलेमान* जमाअत मे क्यूँ नही थे। उनकी वालिदा हजरते शिफा ने अर्ज किया कि रात भर जाग कर इबादत करते रहे फज्र की जमाअत के वक़्त नींद आ गई और जमाअत मे शरीक होने से रह गए। *अमीरूल मोमनीन हजरत उमर फ़ारूखे आजम रदीअल्लाहो ताला अनहु* ने फरमाया कि मेरे नजदीक सारी रात जाग कर इबादत करने से फज्र की जमाअत मे शरीक होना ज्यादा अच्छा है।
📗 *(मिश्कात बाबुल जमाअत सफहा 97)*
📚 *गलत फ़हमियाँ और उनकी इस्लाह सफहा, 36*
*खुलासा :-* यही है। आज कल कुछ लोग फ़र्ज से ज़्यादा नफ़्ल को अहिमयत देते है। और वजीफात कलमात मे ज़्यादा रूज़ू देते है। उन अपने इस्लामी भाईयो से कहना चाहूँगा पहले अपने फ़र्ज के अरकान को पूरा करे फिल नफ़्ल नमाज़ो और कलिमात और वजीफात पढ़ा करे लेकिन बहतर यही है। नफ़्ल नमाज़ अपने घर मे पढ़ी जाए तो अफजल है। मस्जिद मे नफ़्ल ईबादत न ही करे तो बहतर है। हा अगर एतिकाफ़ पर है। तो मस्जिद मे ही करे। लेकिन फ़र्ज नमाज़ो से ज़्यादा नफ़्ल नमाज़ो को अहिमयत देना उनकी सबसे बड़ी ग़लतफ़हमी है। क्यूँ कि जब तक फ़र्ज नमाज़ आपकी मुकम्मल न होंगी तब तक नफ़्ल नमाजे आपकी कोई काम न आएगी।
*अल्लाह रब्बुल इज्जत हम गुनहगारो को इस माहे मुबारक महीने का सदका अता फरमा*
*आमीन सुम्मा आमीन या रब्बुल आलमीन*
*(आला हजरत फरमाते है।)*
"जब तक फर्ज जिम्मे बाक़ी रहता है। कोई नफ्ल कबूल नही किया जाता।
📕 *(अलमलफूज, हिस्सा अव्वल, सफहा 77)*
हदीश शरीफ मे है। कि *हजरते उमर रदीअल्लाहो ताला अनहु* एक दिन फज्र की जमाअत मे *हजरते सुलेमान बिन अबी हसमा रदीअल्लाहो ताला अनहु* को नही पाया दिन मे बाज़ार जाते वक़्त उनके घर के पास से गुजरे तो उनकी माँ से पूँछा कि आज *सुलेमान* जमाअत मे क्यूँ नही थे। उनकी वालिदा हजरते शिफा ने अर्ज किया कि रात भर जाग कर इबादत करते रहे फज्र की जमाअत के वक़्त नींद आ गई और जमाअत मे शरीक होने से रह गए। *अमीरूल मोमनीन हजरत उमर फ़ारूखे आजम रदीअल्लाहो ताला अनहु* ने फरमाया कि मेरे नजदीक सारी रात जाग कर इबादत करने से फज्र की जमाअत मे शरीक होना ज्यादा अच्छा है।
📗 *(मिश्कात बाबुल जमाअत सफहा 97)*
📚 *गलत फ़हमियाँ और उनकी इस्लाह सफहा, 36*
*खुलासा :-* यही है। आज कल कुछ लोग फ़र्ज से ज़्यादा नफ़्ल को अहिमयत देते है। और वजीफात कलमात मे ज़्यादा रूज़ू देते है। उन अपने इस्लामी भाईयो से कहना चाहूँगा पहले अपने फ़र्ज के अरकान को पूरा करे फिल नफ़्ल नमाज़ो और कलिमात और वजीफात पढ़ा करे लेकिन बहतर यही है। नफ़्ल नमाज़ अपने घर मे पढ़ी जाए तो अफजल है। मस्जिद मे नफ़्ल ईबादत न ही करे तो बहतर है। हा अगर एतिकाफ़ पर है। तो मस्जिद मे ही करे। लेकिन फ़र्ज नमाज़ो से ज़्यादा नफ़्ल नमाज़ो को अहिमयत देना उनकी सबसे बड़ी ग़लतफ़हमी है। क्यूँ कि जब तक फ़र्ज नमाज़ आपकी मुकम्मल न होंगी तब तक नफ़्ल नमाजे आपकी कोई काम न आएगी।
*अल्लाह रब्बुल इज्जत हम गुनहगारो को इस माहे मुबारक महीने का सदका अता फरमा*
*आमीन सुम्मा आमीन या रब्बुल आलमीन*
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