कहीं कहीं देखने मे आता है। कि इमाम मेहराब मे अन्दर है। और मुक़तदी बाहर यह खिलाफे सुन्नत और मकरूह है। *सदरूश्शरीआं हजरत मौलाना अमजद अली साहब अलैहिर्रहमह* फरमाते है।
इमाम को तन्हा मेहराब मे खड़ा होना मकरूह है। और अगर बाहर खड़ा हो सिर्फ सज्दा मेहराब मे किया या वह तन्हा न हो बल्कि उसके साथ कुछ मुक़तदी भी मेहराब मे साथ हों तो कुछ हर्ज नही, यूँ ही अगर मुक़तदीयो पर मस्जिद तंग हो तो भी मेहराब मे खड़ा होना भी मकरूह है।
📗 *(बहारे शरीअत हिस्सा सोम सफ़ा 174 बहवाला दुर्रे मुख़्तार व आलमगीरी)*
इसका तरीका यह है। कि इमाम का मुसल्ला थोड़ा पीछे हटा दिया जाये और बह थोड़ा पीछे हट कर इस तरह खड़ा हो कि देखने मे महसूस हो कि वह मेहराब या दरो में अन्दर नही है। बल्कि बाहर खड़ा है। फिर चाहे सज्दा अन्दर हो, नमाज़ दुरूस्त हो जायेगी।
📚 *गलत फ़हमियाँ और उनकी इस्लाह सफहा, 37*
इमाम को तन्हा मेहराब मे खड़ा होना मकरूह है। और अगर बाहर खड़ा हो सिर्फ सज्दा मेहराब मे किया या वह तन्हा न हो बल्कि उसके साथ कुछ मुक़तदी भी मेहराब मे साथ हों तो कुछ हर्ज नही, यूँ ही अगर मुक़तदीयो पर मस्जिद तंग हो तो भी मेहराब मे खड़ा होना भी मकरूह है।
📗 *(बहारे शरीअत हिस्सा सोम सफ़ा 174 बहवाला दुर्रे मुख़्तार व आलमगीरी)*
इसका तरीका यह है। कि इमाम का मुसल्ला थोड़ा पीछे हटा दिया जाये और बह थोड़ा पीछे हट कर इस तरह खड़ा हो कि देखने मे महसूस हो कि वह मेहराब या दरो में अन्दर नही है। बल्कि बाहर खड़ा है। फिर चाहे सज्दा अन्दर हो, नमाज़ दुरूस्त हो जायेगी।
📚 *गलत फ़हमियाँ और उनकी इस्लाह सफहा, 37*
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